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महाराष्ट्र पशु चारा दरें
मंत्री पंकजा मुंडे ने की घोषणा; राज्य के 304 तालुकों में सूखे की स्थिति को देखते हुए फैसला, चारे की गुणवत्ता और सुरक्षित भंडारण के मानक भी निर्धारित
मुंबई (कृषि भूमि ब्यूरो): महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति के दौरान पशुधन को चारे की कमी से बचाने और पशुपालकों को राहत देने के लिए राज्य सरकार ने सूखे चारे और साइलेज (मुरघास) की खरीद की अधिकतम आधार दरें निर्धारित कर दी हैं। इसके तहत सूखे चारे की दर अधिकतम 12 रुपये प्रति किलोग्राम और साइलेज की दर 8 रुपये प्रति किलोग्राम तय की गई है। इन दरों में परिवहन खर्च शामिल नहीं होगा। परिवहन का भुगतान अलग से निर्धारित सरकारी दरों के अनुसार किया जाएगा।

पर्यावरण एवं पशुपालन मंत्री पंकजा मुंडे ने 30 अक्टूबर को इस निर्णय की जानकारी देते हुए कहा कि सरकार का उद्देश्य सूखे के दौरान पशुओं को गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित चारा उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि पशुधन किसानों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता है।

304 तालुकों में सूखे के बाद सरकार का फैसला

खरीफ सीजन की समीक्षा के बाद महाराष्ट्र के कुल 304 तालुकों में सूखा घोषित किया गया है। इसके बाद संभावित चारा संकट से निपटने के लिए राजस्व मंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट उप-समिति ने एक अध्ययन समूह का गठन किया था। मंत्री पंकजा मुंडे भी इस समूह की सदस्य थीं।

अध्ययन समूह ने महाराष्ट्र सहित दूसरे राज्यों में अपनाई जा रही चारा प्रबंधन व्यवस्थाओं का विश्लेषण किया। इसमें राज्य में उपलब्ध चारे की मात्रा, संभावित उत्पादन और आने वाले महीनों में पशुधन के लिए चारे की अनुमानित जरूरत का आकलन किया गया। इन पहलुओं के आधार पर तैयार रिपोर्ट को 27 अक्टूबर को हुई कैबिनेट उप-समिति की बैठक में मंजूरी दी गई। इसके बाद सरकार ने चारे की खरीद के लिए संशोधित आधार दरें निर्धारित कीं।

जिला समितियां करेंगी चारे की खरीद

सरकार द्वारा निर्धारित दरें राहत एवं पुनर्वास विभाग की ओर से घोषित सूखा अवधि के दौरान लागू रहेंगी। चारे की खरीद जिला स्तर पर गठित सूखा प्रबंधन कार्यकारी समितियों के माध्यम से की जाएगी। ये समितियां अध्ययन समूह की रिपोर्ट और राहत एवं पुनर्वास विभाग के दिशा-निर्देशों के अनुसार खरीद प्रक्रिया संचालित करेंगी।

परिवहन खर्च का भुगतान परिवहन आयुक्त की ओर से समय-समय पर निर्धारित दरों के आधार पर किया जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जरूरत के अनुसार चारे की आपूर्ति सुनिश्चित करना और पशुपालकों को संकट के समय राहत पहुंचाना है।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 12 और 8 रुपये प्रति किलोग्राम की दरें सरकार की ओर से की जाने वाली चारा खरीद की अधिकतम आधार दरें हैं। इन्हें खुले बाजार में निजी बिक्री की अधिकतम कीमत नहीं समझा जाना चाहिए।

महाराष्ट्र पशु चारा दरें
सूखे की स्थिति में पशुधन के लिए चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से महाराष्ट्र सरकार ने खरीद की दरें और गुणवत्ता मानक तय किए हैं।

चारे की गुणवत्ता के लिए सख्त मानक

सरकार ने केवल खरीद की दरें ही तय नहीं की हैं, बल्कि चारे की गुणवत्ता और पोषण संबंधी मानक भी निर्धारित किए हैं। सूखे चारे में नमी की मात्रा 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। चारा साफ-सुथरा और अच्छी स्थिति में होना चाहिए। उसमें खट्टी या सीलन की गंध, फफूंद, कीड़े और मिट्टी नहीं होनी चाहिए। खरीद में ज्वार और बाजरे के चारे को प्राथमिकता दी जाएगी।

साइलेज यानी मुरघास के लिए भी स्पष्ट गुणवत्ता मानक बनाए गए हैं। इसे पूरी तरह हवा-बंद स्थिति में तैयार और सुरक्षित रखा जाना चाहिए। इसमें किसी तरह की फफूंद नहीं होनी चाहिए। साइलेज में नमी की मात्रा 62 से 70 प्रतिशत के बीच, पीएच स्तर 3.5 से 4.4 के बीच और कच्चे प्रोटीन की मात्रा कम से कम 7 प्रतिशत होनी अनिवार्य है।

इसके अलावा, गुणवत्ता के अन्य मानकों के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के IS 19562:2026 के प्रावधान लागू होंगे। इन मानकों का उद्देश्य पशुओं को खराब या दूषित चारा मिलने से रोकना और उनके स्वास्थ्य एवं पोषण का ध्यान रखना है।

पशुपालकों की आजीविका बचाने पर जोर

सूखे के दौरान किसानों को खेती के साथ पशुधन के रखरखाव की चुनौती भी झेलनी पड़ती है। चारे की कमी होने पर पशुओं के पोषण, दूध उत्पादन और पशुपालन से होने वाली आय पर सीधा असर पड़ सकता है। छोटे और सीमांत पशुपालकों के लिए यह चुनौती और गंभीर हो जाती है।

मंत्री पंकजा मुंडे के अनुसार, सरकार की रणनीति केवल चारे की कीमतें तय करने तक सीमित नहीं है। जिला स्तर पर जरूरत के अनुरूप योजना तैयार करने, उपलब्ध चारे का बेहतर प्रबंधन करने और निर्धारित गुणवत्ता के अनुसार खरीद सुनिश्चित करने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

राज्य सरकार का यह कदम सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पशुधन की सुरक्षा और पशुपालकों की आजीविका को बनाए रखने के प्रयास का हिस्सा है। हालांकि, इस व्यवस्था की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जिला स्तर पर चारे की खरीद और जरूरतमंद पशुपालकों तक उसकी आपूर्ति कितनी प्रभावी ढंग से होती है।

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