नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): भारत का मक्का क्षेत्र तेजी से एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है। एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम, पोल्ट्री फीड उद्योग और स्टार्च आधारित औद्योगिक प्रसंस्करण की बढ़ती मांग ने इसे पारंपरिक अनाज से रणनीतिक कृषि फसल में बदल दिया है। FICCI और YES BANK की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025-26 में करीब 5 करोड़ मीट्रिक टन रहने वाली मक्का की घरेलू मांग 2030-31 तक बढ़कर 7.2 करोड़ टन तक पहुंच सकती है।
“Maize Sector in India – Navigating Transformation in Demand-Supply Dynamics” शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती मक्का अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है। पिछले एक दशक में देश का मक्का उत्पादन लगभग दोगुना हुआ है। वर्ष 2015-16 में जहां उत्पादन 2.25 करोड़ टन था, वहीं 2025-26 में यह करीब 5 करोड़ टन तक पहुंच गया।
रिपोर्ट के अनुसार भारत में अब कुल खाद्यान्न उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी लगभग 14% हो चुकी है और देश के 27 राज्यों में करीब 1.7 करोड़ किसान इसकी खेती कर रहे हैं। चावल और गेहूं के बाद यह देश का तीसरा सबसे बड़ा अनाज बन चुका है।
एथेनॉल ब्लेंडिंग से बदल रहा मांग का स्वरूप
भारत सरकार का एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम मक्का की मांग में उछाल का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्का ने गन्ने और चावल को पीछे छोड़ते हुए प्रमुख फीडस्टॉक का स्थान हासिल कर लिया है।
वर्ष 2024-25 में लगभग 1.25 करोड़ टन मक्का का उपयोग एथेनॉल उत्पादन में किया गया, जो इस क्षेत्र में इस्तेमाल कुल फीडस्टॉक का करीब 50% था। भारत ने जुलाई 2025 तक 19.93% एथेनॉल ब्लेंडिंग हासिल कर ली, जो सरकार के E20 लक्ष्य के काफी करीब माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2030-31 तक अकेला एथेनॉल उद्योग 2 से 2.5 करोड़ टन मक्का की खपत कर सकता है। सरकार द्वारा प्रशासनिक मूल्य निर्धारण, जीएसटी में राहत और अनाज आधारित डिस्टिलरी को ब्याज सब्सिडी जैसी नीतियों ने इस क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा दिया है।
पोल्ट्री और स्टार्च उद्योग बने बड़े उपभोक्ता
एथेनॉल के अलावा पोल्ट्री और पशु आहार उद्योग भारत में मक्का के सबसे बड़े उपभोक्ता बने हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार कुल मक्का खपत का लगभग 54% हिस्सा पशु आहार उद्योग में उपयोग होता है, जिसमें 44% पोल्ट्री फीड और 10% पशुधन फीड शामिल है।
पोल्ट्री फीड में मक्का की हिस्सेदारी 60-65% तक रहती है क्योंकि इसमें उच्च ऊर्जा मूल्य और बेहतर पोषण क्षमता होती है। भारत में तेजी से बढ़ते पोल्ट्री, डेयरी और एक्वाकल्चर सेक्टर आने वाले वर्षों में मक्का की मांग को और मजबूत करेंगे।
इसी तरह स्टार्च उद्योग हर साल करीब 70 लाख टन मक्का का उपयोग कर रहा है। खाद्य प्रसंस्करण, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, पेपर और बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक उद्योगों में मक्का आधारित उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है।
भारत की उत्पादकता अभी भी वैश्विक औसत से कम
तेज वृद्धि के बावजूद भारत की मक्का उत्पादकता अभी भी कई प्रमुख देशों से पीछे है। वर्ष 2025-26 में देश की औसत उत्पादकता 3.7 टन प्रति हेक्टेयर रही, जबकि वैश्विक औसत 6.04 टन प्रति हेक्टेयर है।
हालांकि पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है, जहां उत्पादकता क्रमशः 6.9 टन और 6.8 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। इसके बावजूद कई राज्यों में वर्षा आधारित खेती, सीमित मशीनीकरण और उन्नत हाइब्रिड बीजों का कम उपयोग उत्पादन वृद्धि में बाधा बना हुआ है।
भारत के मक्का क्षेत्र के प्रमुख आंकड़े
| संकेतक | 2015-16 | 2025-26 | 2030-31 अनुमान |
|---|---|---|---|
| मक्का उत्पादन | 2.25 करोड़ टन | 5 करोड़ टन | — |
| मक्का मांग | — | 5 करोड़ टन | 7.2 करोड़ टन |
| औसत उत्पादकता | 2.5 टन/हेक्टेयर (अनुमानित) | 3.7 टन/हेक्टेयर | — |
| एथेनॉल क्षेत्र में खपत | सीमित | 1.25 करोड़ टन | 2-2.5 करोड़ टन |
सप्लाई चेन और भंडारण बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि सप्लाई चेन और भंडारण ढांचे में सुधार नहीं हुआ तो मांग वृद्धि का पूरा लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाएगा। वैज्ञानिक सुखाने की सुविधाओं, नमी प्रबंधन और आधुनिक भंडारण की कमी बड़ी समस्या बनी हुई है।
एफ्लाटॉक्सिन प्रदूषण को भी गंभीर चुनौती बताया गया है, जिससे गुणवत्ता, निर्यात प्रतिस्पर्धा और किसानों की आय प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार भारत “नई मक्का क्रांति” के मुहाने पर खड़ा है, लेकिन इसके लिए सार्वजनिक और निजी निवेश, वैज्ञानिक नवाचार और मजबूत बाजार संपर्क जरूरी होंगे, ताकि किसान हितों, औद्योगिक मांग और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
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