नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): पाम ऑयल: भारत में खाद्य तेलों की बढ़ती मांग के बीच तेल वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में वनस्पति तेल आयात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के अनुसार नवंबर से अप्रैल की अवधि में देश का कुल वनस्पति तेल आयात 13 प्रतिशत बढ़कर 79.4 लाख टन पहुंच गया। पिछले वर्ष की समान अवधि में यह आंकड़ा 70.4 लाख टन था।
विशेषज्ञों के मुताबिक इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह पाम ऑयल आयात में तेज उछाल रही। वैश्विक बाजार में कीमतों में तेजी और रुपये की कमजोरी के कारण आयात बिल पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ा है।
पाम ऑयल आयात में 45 फीसदी की वृद्धि
SEA की रिपोर्ट के अनुसार भारत का पाम ऑयल आयात पहली छमाही में करीब 45 प्रतिशत बढ़कर 39.7 लाख टन पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 27.4 लाख टन था। पाम ऑयल भारत के खाद्य तेल बाजार में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले तेलों में शामिल है और इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
दूसरी ओर, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल जैसे सॉफ्ट ऑयल का आयात घटकर 38.5 लाख टन रह गया, जो पिछले वर्ष 41.3 लाख टन था। विशेषज्ञों का मानना है कि पाम ऑयल की उपलब्धता और प्रतिस्पर्धी कीमतों के कारण आयातकों ने इसकी खरीद बढ़ाई।
आयात बिल 87 हजार करोड़ रुपये पहुंचा
मात्रा के साथ-साथ वनस्पति तेल आयात का मूल्य भी तेजी से बढ़ा है। नवंबर-अप्रैल अवधि में खाद्य तेल आयात बिल 19 प्रतिशत बढ़कर लगभग 87,000 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष यह 73,000 करोड़ रुपये था।
SEA के अनुसार वैश्विक बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी इसका प्रमुख कारण रही। अप्रैल 2025 की तुलना में पाम ऑयल की कीमतों में 14 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि हुई, जबकि सोयाबीन और सूरजमुखी तेल की कीमतों में 17 से 22 प्रतिशत तक का उछाल दर्ज किया गया।
रुपये की कमजोरी से बढ़ी लागत
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में आई कमजोरी ने भी आयात लागत बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। पिछले एक वर्ष में रुपये में करीब 9.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
SEA ने कहा कि रुपये की कमजोरी आयातकों और रिफाइनर्स के लिए चिंता का विषय बन गई है क्योंकि इससे विदेशी खरीद और अधिक महंगी हो रही है। भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है, इसलिए विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है।
किन देशों से हुआ सबसे ज्यादा आयात
रिपोर्ट के अनुसार इंडोनेशिया और मलेशिया भारत को पाम ऑयल के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता बने रहे। वहीं सोयाबीन तेल के मामले में अर्जेंटीना शीर्ष निर्यातक रहा, जबकि ब्राजील दूसरे स्थान पर रहा।
सूरजमुखी तेल के लिए रूस और यूक्रेन भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ता बने हुए हैं। हालांकि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पिछले कुछ वर्षों में सूरजमुखी तेल आपूर्ति को लेकर वैश्विक बाजार में अस्थिरता देखी गई है।
नेपाल ने भी भारत को बड़ी मात्रा में रिफाइंड खाद्य तेल निर्यात किया। पहली छमाही में नेपाल से लगभग 2.17 लाख टन रिफाइंड खाद्य तेल भारत आया, जिसमें मुख्य रूप से रिफाइंड सोयाबीन तेल शामिल था।
खाद्य तेल स्टॉक में भी बढ़ोतरी
भारत में खाद्य तेल का स्टॉक भी तेजी से बढ़ा है। मई 2026 में कुल वनस्पति तेल स्टॉक बढ़कर 21.2 लाख टन पहुंच गया, जबकि मई 2025 में यह 13.5 लाख टन था।
SEA का कहना है कि दिसंबर 2025 से लगातार बढ़ रहे स्टॉक संकेत देते हैं कि तेल वर्ष की दूसरी छमाही में आपूर्ति की स्थिति बेहतर रह सकती है। इससे घरेलू बाजार में कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।
घरेलू बाजार पर क्या होगा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि आयात बढ़ने से फिलहाल देश में खाद्य तेलों की उपलब्धता बनी रहेगी, लेकिन वैश्विक कीमतों और रुपये की कमजोरी के कारण उपभोक्ताओं को राहत मिलना आसान नहीं होगा।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेल महंगे बने रहते हैं तो आने वाले महीनों में घरेलू बाजार में भी कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। हालांकि बढ़ता स्टॉक और बेहतर आपूर्ति स्थिति भविष्य में कुछ राहत दे सकती है।
तेल वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में भारत का वनस्पति तेल आयात तेजी से बढ़ा है, जिसमें पाम ऑयल की भूमिका सबसे अहम रही। लेकिन वैश्विक कीमतों में उछाल और कमजोर रुपये ने आयात बिल को भी भारी बना दिया है। आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार और घरेलू मांग की स्थिति यह तय करेगी कि खाद्य तेलों की कीमतों में राहत मिलती है या नहीं।
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