वाराणसी, 9 सितंबर (कृषि भूमि डेस्क):
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR), शहंशाहपुर, वाराणसी ने खेती में उर्वरता बढ़ाने और पौधों की सेहत को बेहतर बनाने के लिए एक नया जैविक समाधान पेश किया है। इस समाधान का नाम बीसी-6 रखा गया है, जो मिट्टी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले छह बैसिलस जीवाणुओं का खास मिश्रण है। यह मिश्रण रासायनिक खादों का पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित और प्रभावी विकल्प प्रदान करता है।
बीसी-6 न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है, बल्कि यह पौधों की सेहत, तनाव प्रबंधन और उत्पाद की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाता है। आइआइवीआर के वैज्ञानिकों का मानना है कि बीसी-6 कृषि क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद देने के साथ-साथ पर्यावरण को भी सुरक्षित रखेगा।
कैसे काम करता है बीसी-6?
बीसी-6 में मिलाए गए बैसिलस जीवाणु फास्फोरस, पोटाश और जिंक जैसे पोषक तत्वों को मिट्टी में घुलनशील रूप में बदलते हैं, जिससे पौधे इन्हें आसानी से अवशोषित कर सकते हैं। ये जीवाणु पौधों के साथ सहजीवी संबंध स्थापित करते हैं और उनकी वृद्धि को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, बीसी-6 पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है, जिससे कीटनाशकों की आवश्यकता कम होती है।
आइआइवीआर के वैज्ञानिक डॉ. डीपी सिंह और डॉ. सुदर्शन मौर्य ने इस जैविक मिश्रण को विकसित करने में चार साल का समय लिया। डॉ. सिंह बताते हैं, “हमने लंबे शोध के बाद छह विशेष बैसिलस जीवाणुओं को चुना, जो न केवल मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाते हैं, बल्कि पौधों की सेहत को भी बेहतर बनाते हैं।”
बीसी-6 से टमाटर में हुए शानदार परिणाम
आइआइवीआर के फसल उन्नयन विभाग के अध्यक्ष डॉ. नागेंद्र राय ने बताया कि बीसी-6 के फील्ड ट्रायल्स में टमाटर की फसल में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। न केवल उत्पादन में वृद्धि हुई, बल्कि गुणवत्ता में भी सुधार हुआ। बीसी-6 के उपयोग से पौधों की ऊंचाई, जड़ों की लंबाई, तने की मोटाई और पत्तियों का क्षेत्रफल बढ़ा।
प्रति पौधा 3.72 किलो तक टमाटर का उत्पादन हुआ। इसके अलावा, टमाटर में विटामिन सी, कैरोटेनायड्स, फ्लेवोनायड्स और लाइकोपीन की मात्रा भी बढ़ी, जो पौष्टिकता के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। बीसी-6 के उपयोग से टमाटर की फसल में प्राकृतिक एंटी-इंफ्लेमेटरी, न्यूरोप्रोटेक्टिव और एंटीमाइक्रोबियल गुण भी पाए गए हैं।
त्रिआयामी उपयोग और किसानों की सुविधा
बीसी-6 को तीन रूपों में तैयार किया गया है – तरल, पाउडर और दानेदार। किसानों को सुविधा प्रदान करने के लिए इसका उपयोग बेहद आसान है। बीज प्राइमिंग से लेकर जड़ शोधन तक, बीसी-6 विभिन्न चरणों में पौधों को मदद करता है:
- बीज प्राइमिंग: बोआई से 12-24 घंटे पहले बीज को बीसी-6 के घोल में भिगोने से अंकुरण में तेजी आती है और पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
- जड़ शोधन: रोपाई से पहले पौधों की जड़ों को बीसी-6 के घोल में डुबोने से जड़ों का विकास तेज होता है और पौधे में पानी को धारण करने की क्षमता बढ़ती है।
- कीटों और रोगों से बचाव: जब पौधे थोड़ा बड़े हो जाते हैं, तो बीसी-6 का छिड़काव उन्हें कीटों और रोगों से बचाता है।
बीसी-6 से होने वाले फायदे:
- पोषक तत्वों की उपलब्धता: फास्फोरस और जिंक जैसे तत्वों को पौधों के लिए उपयोगी रूप में बदलना।
- प्राकृतिक एंटिबायोटिक्स: हानिकारक कवक और बैक्टीरिया के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करना।
- हार्मोन उत्पादन: पौधों की वृद्धि को बढ़ाने वाले हार्मोन जैसे इंडोल एसीटिक एसिड (आइएए) और गिब्बेरेलिन का उत्पादन।
- तनाव प्रबंधन: सूखा, अत्यधिक नमी या तापमान के अत्यधिक प्रभाव से पौधों की सुरक्षा करना।
किसानों के लिए एक वरदान
बीसी-6, किसानों के लिए एक किफायती और पर्यावरण-friendly विकल्प साबित हो सकता है। बढ़ती खाद की कीमतों और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच, यह जैविक मिश्रण किसानों को बेहतर उत्पादकता और गुणवत्ता के साथ-साथ पर्यावरण की सुरक्षा भी प्रदान करता है।
IIVR के निदेशक डॉ. राजेश कुमार कहते हैं, “हमारा उद्देश्य किसानों को ऐसी तकनीक प्रदान करना है, जो न केवल उनकी आय बढ़ाए, बल्कि पर्यावरण को भी सुरक्षित रखें। बीसी-6 इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”
===
हमारे लेटेस्ट अपडेट्स और खास जानकारियों के लिए अभी जुड़ें — बस इस लिंक पर क्लिक करें: