नई दिल्ली, 20 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): MGNREGA Pending Payments – केंद्र सरकार ने मनरेगा योजना के तहत राज्यों के लंबित भुगतान को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। सरकार ने संकेत दिए हैं कि पश्चिम बंगाल सरकार के पुराने बकाया दावों को जारी किए जाने की संभावना बेहद कम है। हालांकि, अन्य राज्यों के लिए राहत की खबर यह है कि जून तक लागू होने वाले नए कानून से पहले सभी वैध बकाए का निपटान कर दिया जाएगा।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को कहा कि जब तक विकसित भारत–रोजगार आजीविका मिशन अधिनियम को अधिसूचित नहीं किया जाता, तब तक मौजूदा मनरेगा कानून ही प्रभावी रहेगा। ऐसे में नए कानून के लागू होने से पहले लंबित भुगतानों को लेकर भ्रम की स्थिति नहीं होनी चाहिए।
फंड रिलीज पर सख्त रुख: ‘ईमानदार खर्च’ की शर्त
राज्यों के बकाया भुगतान को लेकर पूछे गए सवालों पर मंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि सभी लंबित देनदारियां चुकाई जाएंगी, लेकिन केवल उन्हीं खर्चों की जिनकी सत्यता साबित हो सके। उन्होंने कहा कि देनदारी का मतलब राज्यों द्वारा किया गया “ईमानदार खर्च” है। यदि कोई राज्य फर्जी या गलत बिल पेश करता है, तो सरकार ऐसे दावों का भुगतान नहीं कर सकती।
इस बयान को केंद्र सरकार के उस रुख के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें वह मनरेगा में पारदर्शिता और जवाबदेही को प्राथमिकता दे रही है। सरकार का संकेत साफ है कि नए कानून से पहले क्लियरेंस जरूर होगा, लेकिन शर्तों के साथ।
पश्चिम बंगाल विवाद की पृष्ठभूमि
पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र के बीच मनरेगा को लेकर विवाद पिछले तीन साल से जारी है। केंद्र का आरोप है कि राज्य ने योजना के तहत नियमों का पालन नहीं किया, जिसके चलते मार्च 2022 में फंड जारी करना रोक दिया गया। इसके बाद राज्य सरकार ने 2023-24 से मनरेगा कार्यों को बंद कर दिया था।
यह मामला न्यायपालिका तक पहुंचा, जहां पहले कलकत्ता हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मनरेगा कार्यों को दोबारा शुरू करने का आदेश दिया। हालांकि, करीब ₹52,000 करोड़ के कथित बकाए को लेकर केंद्र अब भी अपने रुख पर कायम है। ताजा बयान से साफ हो गया है कि सरकार इस राशि को “स्वीकृत देनदारी” के रूप में मानने के मूड में नहीं है।
नया कानून और सरकार की दलील
नए कानून को लेकर चल रहे राजनीतिक विरोध के बीच शिवराज सिंह चौहान ने सरकार की उपलब्धियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने मनरेगा को कमजोर नहीं, बल्कि पहले से ज्यादा मजबूत किया है। उनके अनुसार, यूपीए सरकार के कार्यकाल में जहां इस योजना पर करीब ₹2 लाख करोड़ खर्च किए गए थे, वहीं मौजूदा सरकार अब तक लगभग ₹9 लाख करोड़ खर्च कर चुकी है।
मंत्री ने यह भी कहा कि सरकार ने रोजगार के दिनों की सीमा बढ़ाकर 125 दिन कर दी है। इसके साथ ही बेरोजगारी भत्ता 15 दिनों के भीतर देने का प्रावधान किया गया है, ताकि काम न मिलने की स्थिति में मजदूरों को तत्काल राहत मिल सके।
125 दिन के काम पर उठे सवाल
हालांकि, 125 दिन के काम के दावे पर विपक्ष सवाल उठा रहा है। इस पर मंत्री ने कहा कि भले ही औसतन काम के दिन कम रहे हों, लेकिन करीब 40 लाख लोगों को पूरे 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया गया है। उनका दावा है कि पहले अधिकार सिर्फ कागजों तक सीमित थे, जबकि अब उन्हें जमीन पर लागू किया गया है।
आगे क्या संकेत देता है यह फैसला
विशेषज्ञों के मुताबिक, केंद्र का यह रुख संकेत देता है कि मनरेगा अब सिर्फ सामाजिक सुरक्षा योजना नहीं, बल्कि सख्त निगरानी वाली रोजगार योजना के रूप में आगे बढ़ेगी। पश्चिम बंगाल के मामले में सरकार किसी तरह की ढील देने के मूड में नहीं दिख रही, जबकि अन्य राज्यों के लिए यह संदेश साफ है कि यदि खर्च नियमों के मुताबिक है, तो भुगतान में देरी नहीं होगी।
जून तक सभी वैध बकाए चुकाने का वादा और नए कानून से पहले स्थिति साफ करना, सरकार की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें वह मनरेगा को नए फ्रेमवर्क में ले जाने से पहले पुराने विवादों को सीमित दायरे में समेटना चाहती है।
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