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गेहूं के भाव स्थिर से मजबूत, एफसीआई टेंडर न आने से बाजार को सहारा

नई दिल्ली, 31 दिसंबर (कृषि भूमि ब्यूरो): देश के अनाज बाजार में गेहूं के भाव आज स्थिर से मजबूत रुख के साथ बने हुए हैं, जिससे किसानों और व्यापारियों दोनों को सहारा मिल रहा है। विशेष रूप से भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की ओर से ओपन मार्केट बिक्री (OMSS) के नए टेंडर जारी न होने से बाजार में अस्थिरता की बजाय स्थिरता का माहौल बना है। इससे व्यापारियों को अनुमान लगाने में आसानी मिल रही है और भावों में गिरावट नहीं आ रही है।

मंडी सूत्रों के अनुसार, हाल के हफ्तों में गेहूं की आवक सामान्य बनी हुई है, लेकिन सरकारी स्तर पर अतिरिक्त आपूर्ति न आने से मांग और आपूर्ति का संतुलन कीमतों के पक्ष में जा रहा है। खासकर प्रमुख उपभोक्ता केंद्रों और आटा मिलों की मांग के चलते भावों में कमजोरी नहीं आ पा रही है।

एफसीआई टेंडर का असर

FCI द्वारा जब भी ओपन मार्केट में गेहूं बिक्री के टेंडर निकाले जाते हैं, तो बाजार पर दबाव बनता है। लेकिन मौजूदा समय में नए टेंडर के अभाव में व्यापारियों को यह संकेत मिल रहा है कि निकट भविष्य में सरकारी आपूर्ति सीमित रह सकती है। इसी वजह से बाजार भाव को सपोर्ट मिल रहा है।

प्रमुख मंडियों का हाल

उत्तर भारत की प्रमुख मंडियों दिल्ली, कानपुर, इंदौर और लुधियाना में गेहूं के भाव पिछले स्तरों के आसपास टिके हुए हैं, जबकि कुछ स्थानों पर हल्की मजबूती भी दर्ज की गई है। मिलर्स की ओर से नियमित खरीद जारी है, जिससे बाजार में स्थिरता बनी हुई है।

  • औसत राष्ट्रीय मंडी भाव: लगभग ₹3,075 प्रति क्विंटल (अधिकतम ₹3,250 तक)
  • न्यूनतम भाव: लगभग ₹2,900 प्रति क्विंटल
  • एक क्विंटल (100 किग्रा) का रेट: ₹2,900 – ₹3,250 के दायरे में कारोबार
  • कुछ मंडियों में भाव: बंथरा (दरा गेहूं) तुलना के लिए करीब ₹2,491 / क्विंटल दर्ज हुआ है।

इन रेटों से स्पष्ट है कि गेहूं के भाव MSP से ऊपर बने हुए हैं, और ओपन मार्केट में खरीद और बिक्री का संतुलित प्रवाह बना हुआ है।

आगे का रुझान

बाजार जानकारों का मानना है कि जब तक एफसीआई की ओर से नए टेंडर नहीं आते और सरकारी नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता, तब तक गेहूं के भाव मौजूदा स्तरों पर टिके रह सकते हैं या हल्की मजबूती दिखा सकते हैं। हालांकि, आगामी समय में नई फसल की आवक और नीति संकेतों पर बाजार की नजर बनी रहेगी। कुल मिलाकर, गेहूं बाजार में मजबूत संतुलन देखने को मिल रहा है, जो एफसीआई टेंडर और मांग–आपूर्ति के संतुलन के कारण संभव हुआ है।

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