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Sunflower Oil: भू-राजनीतिक तनाव का असर; देश में सूरजमुखी तेल की खपत 10% घटने की आशंका

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नई दिल्ली, 03 अप्रैल (कृषि भूमि ब्यूरो): Sunflower Oil – भारत में इस वित्त वर्ष के दौरान रिफाइंड सूरजमुखी तेल की खपत में लगभग 10% गिरावट आने की आशंका जताई गई है। इसकी प्रमुख वजह वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और उससे प्रभावित आपूर्ति श्रृंखला है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने न केवल सप्लाई को बाधित किया है, बल्कि आयात लागत और लॉजिस्टिक खर्च भी बढ़ा दिए हैं।

रेटिंग एजेंसी CRISIL Ratings की रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती कीमतों के चलते उपभोक्ता अब सस्ते विकल्पों जैसे राइस ब्रान और सोयाबीन तेल की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, कीमतों में वृद्धि के कारण उद्योग का कुल राजस्व स्थिर रहने की संभावना है।

Sunflower OilSunflower Oil – आयात निर्भरता और वैश्विक दबाव

भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल उपभोक्ताओं में से एक है, जहां सालाना 250-260 लाख टन खाद्य तेल की खपत होती है। इसमें सूरजमुखी तेल की हिस्सेदारी लगभग 12-14% है। लेकिन यह उद्योग कच्चे तेल के आयात पर काफी निर्भर है, जिससे यह वैश्विक घटनाओं के प्रति संवेदनशील बना रहता है।

भारत मुख्य रूप से Ukraine और Russia से सूरजमुखी तेल आयात करता है। वर्तमान संकट के चलते जहाजों को अब लंबा रास्ता, जैसे केप ऑफ गुड होप, अपनाना पड़ रहा है, जिससे ट्रांजिट समय और लागत दोनों बढ़ गए हैं।

 

Sunflower Oil की कीमतों में उछाल और असर

कच्चे सूरजमुखी तेल की औसत आयात कीमत बढ़कर 1,420-1,440 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है, जो पिछले वर्ष के औसत 1,275 डॉलर प्रति टन से काफी अधिक है। इसके अलावा, रुपये की कमजोरी ने भी आयात लागत को और बढ़ा दिया है।

Sunflower Oil – कीमतों की तुलना दी गई है:

तेल का प्रकारकीमत (₹/लीटर)
सूरजमुखी तेल170-175
जनवरी 2026 (पुराना भाव)~150
राइस ब्रान तेल150-160
सोयाबीन तेल150-165

स्पष्ट है कि सूरजमुखी तेल अन्य विकल्पों की तुलना में 10-20 रुपये प्रति लीटर महंगा हो गया है, जिससे उपभोक्ता धीरे-धीरे सस्ते विकल्पों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं।

मांग घटेगी, लेकिन मुनाफा रहेगा स्थिर

हालांकि खपत में गिरावट की आशंका है, लेकिन रिफाइनिंग कंपनियों की लाभप्रदता पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा। कंपनियां आमतौर पर 10-15 दिनों की देरी से कीमतों में बढ़ोतरी का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल देती हैं।

साथ ही, मजबूत हेजिंग रणनीतियां और कम कीमत पर खरीदे गए पुराने स्टॉक कंपनियों को संतुलन बनाए रखने में मदद कर रहे हैं। अनुमान है कि ऑपरेटिंग मार्जिन 4.8-5% के आसपास स्थिर रहेगा।

घटता स्टॉक और बढ़ता जोखिम

रिपोर्ट के अनुसार, पहले जहां रिफाइनर 30-45 दिनों का कच्चे माल का स्टॉक रखते थे, अब यह घटकर 20-30 दिन रह गया है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है, तो आपूर्ति और सख्त हो सकती है। इसका सीधा असर कीमतों और खरीद रणनीतियों पर पड़ेगा, जिससे आने वाले महीनों में बाजार और अधिक अस्थिर हो सकता है।

वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि भारत का खाद्य तेल बाजार वैश्विक घटनाओं से गहराई से प्रभावित हो रहा है। यदि हालात नहीं सुधरे, तो उपभोक्ताओं का यह रुझान स्थायी रूप से सस्ते विकल्पों की ओर शिफ्ट हो सकता है।

इसके साथ ही, सरकार और उद्योग को आयात निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा, ताकि भविष्य में ऐसे झटकों से बचा जा सके।
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