कमजोर मानसून के बाद रबी बुवाई की रफ्तार धीमी, गेहूं उत्पादन के लक्ष्य पर मौसम की चुनौती
नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): देश में रबी सीजन की शुरुआत इस बार मौसम की चुनौतियों के बीच हुई है। मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश और मिट्टी में नमी की कमी का असर फसलों की शुरुआती बुवाई पर पड़ रहा है। गेहूं के साथ धान, दलहन और तिलहन की बुवाई भी पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले पीछे बताई गई है। हालांकि, कृषि मंत्रालय का कहना है कि अभी कुछ ही राज्यों में रबी फसलों की बुवाई शुरू हुई है और आने वाले हफ्तों में इसमें तेजी आने की उम्मीद है।
सबसे बड़ी चुनौती उन क्षेत्रों में है, जहां खेती काफी हद तक बारिश पर निर्भर है और सिंचाई की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में बुवाई में देरी के साथ-साथ फसलों की शुरुआती बढ़वार और आगे चलकर पैदावार पर भी दबाव पड़ सकता है।
मिट्टी में नमी की कमी से बढ़ी चिंता
रबी फसलों की बुवाई मुख्य रूप से अक्टूबर और नवंबर में होती है। खरीफ सीजन के बाद खेतों में बची नमी और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता इस दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस साल कमजोर मानसून ने इन दोनों मोर्चों पर चिंता बढ़ाई है।
राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, बुंदेलखंड और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में बारिश की कमी का असर अधिक गंभीर हो सकता है, खासकर उन इलाकों में जहां किसान सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहते हैं। मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं होने पर किसानों को बुवाई से पहले खेत तैयार करने के लिए अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है। इससे खेती की लागत बढ़ने और बुवाई में देरी होने का जोखिम है।
हालांकि, सभी क्षेत्रों में स्थिति एक जैसी नहीं है। जिन इलाकों में नलकूप, नहर और अन्य सिंचाई सुविधाएं पर्याप्त हैं, वहां मानसून की कमी का असर अपेक्षाकृत सीमित रह सकता है।
रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन का लक्ष्य, लेकिन मौसम बड़ी चुनौती
केंद्र सरकार ने 2026-27 के रबी सीजन में गेहूं उत्पादन का लक्ष्य 121 मिलियन टन रखा है। यह पिछले सीजन के 120.7 मिलियन टन के रिकॉर्ड उत्पादन से अधिक है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए समय पर बुवाई, बेहतर बीज, संतुलित पोषण और सिंचाई की पर्याप्त उपलब्धता अहम होगी।
इस बीच, अल नीनो की संभावित मजबूती को लेकर भी चिंता बनी हुई है। अल नीनो के प्रभाव से तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव हो सकता है। गेहूं की फसल के लिए बुवाई के समय अनुकूल तापमान और फसल के विकास के दौरान पर्याप्त ठंड महत्वपूर्ण है। खासकर दाना भरने के चरण में तापमान सामान्य से अधिक रहने पर पैदावार प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, केवल अल नीनो की आशंका के आधार पर उत्पादन में गिरावट का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी। वास्तविक असर क्षेत्रवार मौसम, सिंचाई, फसल की किस्म और किसानों की कृषि पद्धतियों पर निर्भर करेगा।
कमजोर मानसून का असर सिंचाई पर भी
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, जून से सितंबर 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन में देश में सामान्य से करीब 12.6 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। बारिश की कमी का असर केवल खेतों की नमी तक सीमित नहीं है। इससे जलाशयों में पानी की उपलब्धता और भूजल पर निर्भरता भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
गेहूं की फसल को बुवाई के बाद अलग-अलग विकास चरणों में सिंचाई की जरूरत पड़ती है। यदि नहरों और जलाशयों में पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं होता, तो किसानों को निजी नलकूपों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। इससे डीजल और बिजली पर खर्च बढ़ सकता है।
दूसरी ओर, प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में मजबूत सिंचाई नेटवर्क के कारण फसल का रकबा बड़े पैमाने पर घटने की आशंका को लेकर कुछ कृषि विशेषज्ञ अपेक्षाकृत आशावादी हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक एम. एल. जाट ने भी सिंचाई सुविधाओं के आधार पर गेहूं के रकबे में बड़ी गिरावट की आशंका को सीमित बताया है।
दलहन और तिलहन की बुवाई पर भी नजर
शुरुआती आंकड़ों में गेहूं के अलावा अन्य रबी फसलों की बुवाई की रफ्तार पर भी नजर रखने की जरूरत है। धान, दलहन और तिलहन का रकबा पिछले साल की समान अवधि से पीछे रहने पर खाद्य तेलों और दालों की घरेलू आपूर्ति को लेकर आगे चिंता बढ़ सकती है। हालांकि, शुरुआती बुवाई के आंकड़ों से पूरे सीजन के उत्पादन का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
सरकार ने कम बारिश और संभावित जल संकट को देखते हुए राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फसल योजना तैयार करने पर जोर दिया है। पानी की कमी वाले इलाकों में कम पानी की जरूरत वाली फसलों, खासकर दलहन और तिलहन, को बढ़ावा देना भी इस रणनीति का हिस्सा है।
अगले कुछ सप्ताह होंगे निर्णायक
रबी सीजन की शुरुआती सुस्ती को देखते हुए आने वाले सप्ताह महत्वपूर्ण होंगे। यदि खेतों में पर्याप्त नमी और सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होता है, तो बुवाई की गति बढ़ सकती है। इसके उलट, सूखे की स्थिति बनी रहने और तापमान सामान्य से अधिक रहने पर फसलों की उत्पादकता पर दबाव पड़ सकता है।
फिलहाल, गेहूं उत्पादन का रिकॉर्ड लक्ष्य और शुरुआती बुवाई की चुनौती साथ-साथ मौजूद हैं। आने वाले दिनों में बुवाई का रकबा, जलाशयों की स्थिति और मौसम के पूर्वानुमान यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि देश इस सीजन में रिकॉर्ड उत्पादन के लक्ष्य के कितने करीब पहुंच पाता है।
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