नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): देश के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर लगातार घटने से जल उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल भंडारण क्षमता का केवल 67 प्रतिशत पानी उपलब्ध है। यह स्थिति पिछले साल की समान अवधि और पिछले 10 वर्षों के औसत की तुलना में काफी कमजोर है। खासकर दक्षिण भारत के जलाशयों में पानी की कमी अधिक गंभीर बनी हुई है, जिसका असर आने वाले समय में पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और कृषि गतिविधियों पर पड़ सकता है।
केंद्रीय जल आयोग की साप्ताहिक रिपोर्ट के अनुसार, इन 178 जलाशयों की कुल भंडारण क्षमता 184.762 अरब घन मीटर (BCM) है। इनमें फिलहाल 123.228 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है। आंकड़ों के मुताबिक, जल उपलब्धता पिछले वर्ष की समान अवधि से 26.5 प्रतिशत अंक और पिछले 10 वर्षों के औसत से 18.5 प्रतिशत अंक कम है।
दक्षिण भारत में जल संकट ज्यादा गंभीर
जलाशयों में पानी की स्थिति को लेकर दक्षिण भारत सबसे अधिक चिंता का विषय बना हुआ है। इस क्षेत्र के जलाशयों की कुल क्षमता 55.879 अरब घन मीटर है, जबकि इनमें केवल 23.659 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है। यानी दक्षिण भारत के प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का करीब 42 प्रतिशत पानी ही बचा है।
तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई जलाशयों में जलस्तर काफी नीचे पहुंच गया है। कुछ बांधों में उनकी कुल भंडारण क्षमता का एक-तिहाई से भी कम पानी शेष है। यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तो इन क्षेत्रों में जल प्रबंधन की चुनौती और बढ़ सकती है।
कम जलस्तर का असर केवल घरेलू पानी की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहता। जलाशयों का पानी सिंचाई, उद्योगों और बिजली उत्पादन जैसी गतिविधियों के लिए भी महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में जल भंडारण में कमी संबंधित राज्यों के लिए अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है।
तमिलनाडु के अलीयार बांध में पानी नहीं
तमिलनाडु में जलाशयों की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक बताई गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य का अलीयार बांध खाली है। वहीं, राज्य के अन्य आठ जलाशयों में से छह में उनकी कुल क्षमता का एक-चौथाई से भी कम पानी बचा है।
यह स्थिति राज्य में पेयजल और सिंचाई प्रबंधन के लिए चुनौती खड़ी कर सकती है। जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं होने से किसानों को सिंचाई के लिए वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर होना पड़ सकता है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव स्थानीय जलापूर्ति व्यवस्था, भूजल की स्थिति और आगे होने वाली बारिश पर भी निर्भर करेगा।
पूरी क्षमता से भरे जलाशयों की संख्या घटी
देश में पूरी क्षमता तक भरे जलाशयों की संख्या घटकर 11 रह गई है। इनमें से चार जलाशय झारखंड में स्थित हैं। यह आंकड़ा बताता है कि जल भंडारण की स्थिति कई क्षेत्रों में कमजोर बनी हुई है।
मध्य भारत को छोड़कर किसी भी क्षेत्र में जलाशयों में पानी का स्तर कुल क्षमता के 80 प्रतिशत से अधिक नहीं है। क्षेत्रीय असमानता के कारण अलग-अलग राज्यों में जल उपलब्धता और प्रबंधन की जरूरतें भी अलग हो सकती हैं।
मानसून की कमी ने बढ़ाई चिंता
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से 15 प्रतिशत कम रहा। मानसून के बाद भी बारिश की कमी ने जलाशयों में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, 1 से 21 अक्टूबर के बीच देश के 734 जिलों में से लगभग 75 प्रतिशत जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। बारिश की यह कमी जलाशयों में पानी की भरपाई की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, मौसम विभाग ने तमिलनाडु, पुडुचेरी, तटीय आंध्र प्रदेश और केरल में अगले सप्ताह की शुरुआत तक बारिश होने का अनुमान जताया है। पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में भी बारिश की संभावना है। इससे दक्षिण भारत के कुछ जलाशयों में जलस्तर सुधरने की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन वास्तविक सुधार बारिश की मात्रा, वितरण और जलाशयों में होने वाले जल प्रवाह पर निर्भर करेगा।
जल संरक्षण और बेहतर प्रबंधन की जरूरत
जलाशयों में घटता पानी यह संकेत देता है कि जल संरक्षण और उपलब्ध संसाधनों के बेहतर प्रबंधन पर ध्यान देना जरूरी है। प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल की प्राथमिकता तय करना, सिंचाई में पानी का कुशल उपयोग करना और स्थानीय स्तर पर जल भंडारण को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण हो सकता है।
आने वाले दिनों में बारिश की स्थिति और केंद्रीय जल आयोग के अगले आंकड़े यह स्पष्ट करने में मदद करेंगे कि जलाशयों में पानी की उपलब्धता में कितना सुधार होता है। फिलहाल दक्षिण भारत के कई हिस्सों में जल संकट की आशंका को देखते हुए सतर्कता और प्रभावी जल प्रबंधन की आवश्यकता बनी हुई है।
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