लखनऊ (कृषि भूमि ब्यूरो): दीपावली के अवसर पर उत्तर प्रदेश की गौशालाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने गौजन्य उत्पादों को प्रोत्साहित करने की पहल की है। पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री धर्मपाल सिंह ने प्रदेश के सभी जनपदों की गौशालाओं में गोबर से बने दीये, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां और अन्य पर्यावरण अनुकूल पूजन सामग्री तैयार कराने के लिए विभागीय अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। इस पहल में गोबर के बेहतर उपयोग, स्थानीय रोजगार और पर्यावरण संरक्षण पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
मंत्री ने बुधवार को विधान भवन स्थित अपने कार्यालय में गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने के संबंध में अधिकारियों के साथ बैठक की। उन्होंने कहा कि गोबर से उपयोगी उत्पाद तैयार करके गौशालाओं की आय बढ़ाई जा सकती है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के अवसर भी विकसित हो सकते हैं।
सभी जिलों की गौशालाओं में तैयार होंगे गौजन्य उत्पाद
सरकार की पहल के तहत गौशालाओं में गोबर एवं मिट्टी से बने दीये, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां और अन्य पूजन सामग्री तैयार करने को प्रोत्साहित किया जाएगा। दीपावली के दौरान इन उत्पादों की मांग को देखते हुए इनके निर्माण और बिक्री की संभावनाओं पर काम करने के निर्देश दिए गए हैं।
धर्मपाल सिंह ने कहा कि गोबर आधारित उत्पादों का उपयोग बढ़ने से गौशालाओं में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा। साथ ही, पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को मिलेगा अवसर
इस योजना के तहत स्थानीय कारीगरों, महिलाओं, स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण युवाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इससे गांवों में छोटे स्तर पर उत्पादन गतिविधियां विकसित करने और अतिरिक्त आय के अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है।
मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि तैयार उत्पादों की गुणवत्ता, आकर्षक डिजाइन और बाजार में उपलब्धता पर ध्यान दिया जाए। इसके लिए स्थानीय मेलों और अन्य आयोजनों में विशेष स्टॉल लगाने की संभावनाओं पर भी काम करने को कहा गया है।
उत्पादों की बेहतर पैकेजिंग, प्रचार-प्रसार और बिक्री की व्यवस्था से गौशालाओं को अपने उत्पाद अधिक लोगों तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस पहल से होने वाली वास्तविक आय और रोजगार के अवसर उत्पादन तथा बाजार में मांग पर निर्भर करेंगे।
गोबर से जैविक खाद और अन्य उत्पाद बनाने पर भी जोर
गौशालाओं में गोबर का उपयोग केवल दीये और मूर्तियां बनाने तक सीमित नहीं रहेगा। मंत्री ने जैविक खाद और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने की संभावनाओं पर भी जोर दिया। इससे गोबर का मूल्यवर्धन किया जा सकेगा और गौशालाओं के लिए आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित हो सकते हैं।
गोबर एवं मिट्टी से तैयार उत्पादों को बढ़ावा देने का उद्देश्य पारंपरिक संसाधनों के उपयोग के साथ पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को प्रोत्साहित करना भी है। इस दिशा में स्थानीय स्तर पर उत्पादन और विपणन की व्यवस्था विकसित करना महत्वपूर्ण होगा।
गौशालाओं की आय बढ़ाने पर सरकार का जोर
धर्मपाल सिंह ने कहा कि गौशालाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ने से गोवंश के संरक्षण, बेहतर देखभाल और गौशालाओं की व्यवस्थाओं को मजबूत करने में सहायता मिल सकती है। उत्पादों की बिक्री से होने वाली आय का उपयोग गौशालाओं की आवश्यकताओं को पूरा करने में किया जा सकता है।
बैठक में पशुधन एवं दुग्ध विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव मुकेश कुमार मेश्राम ने भी अधिकारियों को प्रदेश के सभी जनपदों में इस दिशा में आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने गौशालाओं में उपलब्ध गोबर के बेहतर उपयोग, स्थानीय कारीगरों और स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी तथा उत्पादों के विपणन पर विशेष ध्यान देने को कहा।
अब इस पहल के तहत उत्पाद निर्माण, बाजार तक पहुंच और बिक्री की व्यवस्था को विकसित करना अहम होगा। यदि स्थानीय स्तर पर उत्पादन और विपणन को प्रभावी ढंग से जोड़ा जाता है, तो इससे गौशालाओं की आय बढ़ाने और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर विकसित करने में मदद मिल सकती है।
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