लखनऊ (कृषि भूमि ब्यूरो): उत्तर प्रदेश में सितंबर के अंतिम सप्ताह में हुई भारी बारिश ने राज्य के कई हिस्सों में जनजीवन के साथ-साथ कृषि गतिविधियों को भी प्रभावित किया है। 25 से 27 सितंबर के बीच राज्य के 75 में से 56 जिलों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में उत्तर प्रदेश में 66.5 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 7.6 मिमी रहती है। यह करीब 775 फीसदी अधिक बारिश है।
लगातार बारिश के कारण कई जिलों में जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति बनी। खेतों में पानी भरने से खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आई हैं। हालांकि, फसलों को हुए कुल नुकसान का अंतिम आंकड़ा अभी सामने नहीं आया है और प्रशासन की ओर से नुकसान का आकलन किया जा रहा है।
56 जिलों में सामान्य से ज्यादा बारिश
बारिश की तीव्रता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ जिलों में सामान्य से कई हजार फीसदी अधिक बारिश दर्ज की गई। फरीदाबाद नहीं, बल्कि फर्रुखाबाद में सामान्य से 7,385 फीसदी अधिक, कन्नौज में 5,664 फीसदी, शाहजहांपुर में 4,408 फीसदी, हमीरपुर में 4,240 फीसदी और महोबा में 4,100 फीसदी अधिक बारिश दर्ज की गई।
कानपुर, वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर और बरेली समेत कई इलाकों में तेज बारिश के साथ 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं भी चलीं। कई जगह पेड़ और बिजली के खंभे गिरने से सड़क और बिजली व्यवस्था प्रभावित हुई तथा निचले इलाकों में पानी भर गया।
फसलों पर बारिश का असर, नुकसान का आकलन जारी
कृषि क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी चिंता खेतों में जमा पानी है। सितंबर के अंत में हुई यह बारिश कई इलाकों में खड़ी फसलों के लिए नुकसानदेह साबित हुई है। लगातार जलभराव से खेतों में फसलें गिरने, जड़ों में पानी जमा होने और कटाई से पहले उपज प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है।
हालांकि, प्रशासन अभी फसल नुकसान का विस्तृत आकलन कर रहा है। इसलिए किसानों को हुए नुकसान का जिला-वार अंतिम आंकड़ा आने के बाद ही स्थिति की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी। अधिकारियों को प्रभावित क्षेत्रों में राहत एवं नुकसान का आकलन तेज करने के निर्देश दिए गए हैं।
मौसम प्रणाली कमजोर, लेकिन बाढ़ का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं
IMD के अनुसार, भारी बारिश के पीछे बंगाल की खाड़ी से आए एक डीप डिप्रेशन और उत्तर-पश्चिम भारत में मौजूद वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के बीच संभावित अंतःक्रिया प्रमुख कारण रही। इस मौसम प्रणाली के कारण उत्तर प्रदेश में तीन दिनों तक अत्यधिक बारिश हुई। बाद में डिप्रेशन कमजोर होकर वेल-मार्क्ड लो-प्रेशर एरिया में बदल गया, जिससे बारिश की तीव्रता में कमी आने की संभावना बनी।
हालांकि, नदियों के जलस्तर और स्थानीय जलभराव की स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है। घाघरा और राप्ती जैसी नदियों के जलस्तर में बढ़ोतरी से निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ा था। प्रशासन ने जलभराव वाले क्षेत्रों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और राहत अभियान जारी रखने के निर्देश दिए।
कुशीनगर में नारायणी नदी का तटबंध टूटा
बारिश से जुड़ी स्थिति का असर 29 सितंबर को भी सामने आया। कुशीनगर जिले में नारायणी नदी के पास तटबंध टूटने से आसपास के कई गांवों में पानी भर गया। इसके बाद प्रशासन और आपदा प्रबंधन टीमों को राहत एवं बचाव अभियान चलाने तथा प्रभावित ग्रामीणों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के निर्देश दिए गए।
राज्य सरकार ने जलभराव वाले क्षेत्रों में जल निकासी, बिजली व्यवस्था की बहाली और पानी उतरने के बाद साफ-सफाई एवं सैनिटाइजेशन पर भी जोर दिया है।
राहत के साथ किसानों के लिए अब नुकसान का सही आकलन अहम
बारिश की तीव्रता कम होने के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित किसानों और ग्रामीण परिवारों तक राहत पहुंचाने तथा फसल और संपत्ति के नुकसान का सटीक आकलन करने की है। शुरुआती 25–27 सितंबर की रिपोर्ट में 1,021 मकानों के क्षतिग्रस्त होने की जानकारी थी, जबकि बाद की रिपोर्टों में यह आंकड़ा बढ़कर 2,254 मकानों तक पहुंचा। इससे स्पष्ट है कि नुकसान का आकलन अभी भी अपडेट हो रहा है।
कृषि क्षेत्र में अंतिम नुकसान का आकलन आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किन जिलों और किन फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। फिलहाल प्रशासन के सामने प्राथमिकता राहत, जल निकासी, प्रभावित लोगों की सुरक्षा और किसानों के नुकसान का दस्तावेजीकरण है।
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