नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): भारत में 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून अब ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां बारिश की मात्रा के साथ-साथ उसके क्षेत्रीय वितरण को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। निजी मौसम एजेंसी Skymet ने 18 अगस्त को अपने मानसून अनुमान को और घटाकर Long Period Average (LPA) का 85% कर दिया और सामान्य से कम बारिश की स्थिति के साथ सूखे का जोखिम बढ़ने की बात कही है।
इससे पहले भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भी जुलाई के अंत में मानसून के दूसरे हिस्से यानी अगस्त-सितंबर के दौरान देश में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई थी। IMD के अनुसार इस अवधि में देश के बड़े हिस्से में बारिश सामान्य से कम रह सकती है, हालांकि कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश भी हो सकती है।
बारिश की कमी का सीधा असर खरीफ फसलों पर
मानसून की मौजूदा स्थिति किसानों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगस्त का समय खरीफ फसलों के विकास के लिहाज से बेहद अहम होता है। धान, सोयाबीन, कपास, मक्का, दालें और तिलहन जैसी फसलों को इस समय पर्याप्त नमी की जरूरत होती है।
हालिया रिपोर्टों के मुताबिक देश में बारिश का वितरण काफी असमान रहा है। कई कृषि जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई है, जबकि कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश के कारण बाढ़ और जलभराव जैसी स्थिति भी बनी है। इस असमानता से खेती के लिए उपलब्ध मिट्टी की नमी और फसल उत्पादकता पर क्षेत्रवार अलग-अलग असर पड़ सकता है।
खास चिंता उन इलाकों में है जहां खेती काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर है। कम बारिश की स्थिति में किसानों को अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है, जिससे डीजल, बिजली और पानी की लागत बढ़ सकती है।
धान और दूसरी खरीफ फसलों पर दबाव
बारिश की कमी का असर कुछ फसलों के रकबे पर भी दिखाई देने लगा है। 2026 के खरीफ सीजन में धान की बुवाई का क्षेत्र पिछले साल की तुलना में कम रहने की रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार 17 अगस्त तक धान का रकबा करीब 3.65% कम था, जिसमें कर्नाटक, झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बारिश की कमी एक प्रमुख कारण रही।
यदि अगस्त और सितंबर में बारिश कमजोर रहती है, तो पहले से बोई गई फसलों के लिए नमी की उपलब्धता चुनौती बन सकती है। खासकर वर्षा आधारित क्षेत्रों में लंबे शुष्क दौर का असर फसल की वृद्धि और अंतिम पैदावार पर पड़ सकता है।
अल नीनो ने बढ़ाई मौसम की चिंता
कमजोर मानसून के बीच अल नीनो भी कृषि बाजार के लिए महत्वपूर्ण जोखिम बनकर उभरा है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति मजबूत होने से भारतीय मानसून के दूसरे हिस्से पर दबाव बढ़ सकता है। इसी वजह से Skymet ने अपने अनुमान में और कटौती की है।
हालांकि सरकार का आकलन अपेक्षाकृत आशावादी है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि इस साल अल नीनो का खरीफ उत्पादन पर महत्वपूर्ण असर पड़ने की संभावना नहीं है। सरकार के मुताबिक बुवाई की स्थिति में सुधार हुआ है और देश के अधिकांश हिस्सों में फसलों के लिए बारिश पर्याप्त रही है।
इस तरह मौसम एजेंसियों के कमजोर मानसून के संकेत और सरकार के अपेक्षाकृत सकारात्मक उत्पादन आकलन के बीच आने वाले हफ्ते बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं।
किसानों और कृषि बाजार पर क्या होगा असर?
अगर बारिश की कमी लंबी खिंचती है, तो इसका असर केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा। ग्रामीण आय, कृषि मजदूरी, सिंचाई खर्च और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बन सकता है। वहीं, जिन इलाकों में पर्याप्त बारिश बनी रहती है, वहां फसल की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रह सकती है।
कमजोर मानसून से दालों, तिलहनों और अनाज की कीमतों में तेजी की आशंका भी बाजार में बढ़ सकती है, हालांकि इसका वास्तविक असर फसल उत्पादन, सरकारी खरीद, आयात नीति और आगे मिलने वाली बारिश पर निर्भर करेगा।
आगे की बारिश पर टिकी किसानों की उम्मीद
फिलहाल किसानों और कृषि कारोबारियों की नजर अगस्त के बचे दिनों और सितंबर की बारिश पर है। मौसम का क्षेत्रीय वितरण आने वाले समय में सबसे बड़ा निर्णायक कारक रहेगा।
कुलमिलाकर, मानसून की कमजोरी ने किसानों की चिंता जरूर बढ़ाई है, लेकिन फसल नुकसान का अंतिम आकलन अभी जल्दबाजी होगा। यदि आने वाले हफ्तों में अच्छी बारिश होती है, तो मौजूदा कमी की भरपाई कुछ हद तक संभव है। इसके विपरीत लंबे शुष्क दौर से खरीफ उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
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