नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): India-US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर देश में राजनीतिक और आर्थिक बहस तेज हो गई है। अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने इस समझौते पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के इस्तीफे की मांग की है। संगठन का आरोप है कि सरकार किसानों, संसद और राज्य सरकारों को अंधेरे में रखकर यह समझौता कर रही है।
India-US Trade Deal: AIKS की मुख्य चिंताएं और आरोप
किसान संगठन ने केंद्र सरकार पर संविधान की अवहेलना करने का आरोप लगाया है। AIKS के अनुसार:
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कृषि उत्पादों का आयात: समझौते से अमेरिकी गेहूं, मक्का, सोयाबीन, कपास और डेयरी उत्पादों का शुल्क-मुक्त आयात हो सकता है, जिससे भारतीय बाजार में इन उत्पादों की भरमार हो जाएगी।
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आजीविका पर संकट: भारी सब्सिडी वाले अमेरिकी उत्पादों के आने से देश के छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।
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MSP का मुद्दा: संगठन ने तर्क दिया कि 2025-26 में कपास और सोयाबीन की कीमतें पहले ही MSP से नीचे रही हैं; ऐसे में आयात बढ़ने से संकट और गहरा जाएगा।
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पारदर्शिता की कमी: AIKS ने मांग की है कि किसी भी अंतिम निर्णय से पहले व्यापार समझौतों (FTA) का मसौदा सार्वजनिक किया जाए।
India-US Trade Deal: संगठन ने किसानों से 22 जुलाई को संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) द्वारा आयोजित राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन में बढ़-चढ़कर भाग लेने का आह्वान किया है।

सरकार का रुख: “दावे बेबुनियाद”
दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने इन सभी आशंकाओं को सिरे से खारिज किया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया है कि भारत द्वारा समझौते में देरी करने की मीडिया रिपोर्ट्स “पूरी तरह गलत और भ्रामक” हैं।
“हमारी टीमें एक संतुलित और व्यावसायिक रूप से सार्थक समझौते के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। यह समझौता हमारे किसानों, श्रमिकों और उपभोक्ताओं के हित में होगा।” – पीयूष गोयल, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री
गोयल ने बताया कि हाल ही में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीयर के साथ हुई बैठकें सकारात्मक रहीं और बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ रही है। सरकार का यह भी कहना है कि किसी भी स्थिति में भारतीय कृषि क्षेत्र के हितों से समझौता नहीं किया जाएगा।
व्यापार वार्ता का भविष्य
India-US Trade Deal: भारत और अमेरिका दोनों ही एक व्यापक द्विपक्षीय समझौते से पहले एक अंतरिम समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, जहाँ एक ओर सरकार इसे आर्थिक मजबूती के रूप में देख रही है, वहीं किसान संगठनों की चिंताएं यह स्पष्ट करती हैं कि कृषि क्षेत्र की संवेदनशीलता इस डील के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी रहेगी।
आने वाले दिनों में 22 जुलाई का प्रदर्शन यह तय करेगा कि सरकार इन चिंताओं को दूर करने के लिए किस हद तक कदम उठाती है।
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