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भारत-न्यूजीलैंड FTA से बढ़ी सेब बागवानों की चिंता, प्रीमियम बाजार में विदेशी दबाव

नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): India New Zealand FTA: भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) ने देश के सेब उत्पादक राज्यों में चिंता की लहर पैदा कर दी है। खासतौर पर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बागवानों को आशंका है कि सस्ते आयातित सेब उनके बाजार को प्रभावित करेंगे।

समझौते के तहत न्यूजीलैंड से आयात होने वाले सेब पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 50% से घटाकर 25% कर दी गई है। इससे विदेशी सेबों की कीमतों में कमी आएगी और वे भारतीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे।

आयात कोटा और प्रावधानों का असर

भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के प्रावधानों के अनुसार, पहले साल 32,500 टन सेब 25% ड्यूटी पर आयात किए जा सकेंगे, जो छठे साल तक बढ़कर 45,000 टन हो जाएंगे। यह आयात मुख्य रूप से अप्रैल से अगस्त के बीच, यानी भारत के ऑफ-सीजन में होगा। साथ ही 1.25 डॉलर प्रति किलो का न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) भी तय किया गया है।

FTA
FTA के बाद सेब बाजार में बढ़ेगा दबाव

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रावधान सीधे तौर पर प्रीमियम सेब बाजार को प्रभावित करेगा, क्योंकि इसी अवधि में भारत के कोल्ड स्टोरेज से सेब बाजार में आते हैं।

FTA: बागवानों की बढ़ती चिंता

हिमाचल प्रदेश के किसान नेता हरीश चौहान का कहना है कि ड्यूटी में कटौती से न्यूजीलैंड का सेब अब पहले की तुलना में काफी सस्ता होकर भारतीय बाजार में पहुंचेगा। पहले जहां एक बॉक्स की कीमत 3,800–4,000 रुपये तक होती थी, अब यह घटकर लगभग 3,000–3,200 रुपये तक आ सकती है।

बागवानों का आरोप है कि न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) भी उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता। उनका मानना है कि यह नीति घरेलू उत्पादकों के हितों की अनदेखी करती है।

ऑफ-सीजन में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

भारत में सेब का मुख्य उत्पादन सीजन अगस्त से नवंबर तक होता है। इसके बाद कोल्ड स्टोरेज में रखे गए सेब धीरे-धीरे बाजार में बेचे जाते हैं। लेकिन न्यूजीलैंड का उत्पादन चक्र भारत के विपरीत होता है, जिससे विदेशी सेब उसी समय बाजार में उपलब्ध होंगे जब घरेलू सेब स्टोरेज से निकलते हैं।

इस स्थिति में, सस्ते आयातित सेबों के कारण घरेलू प्रीमियम सेबों के दाम गिर सकते हैं, जिससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ेगा।

पहले से दबाव में हैं किसान

सेब उत्पादक किसान पहले ही कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उत्पादन लागत में लगातार वृद्धि, जलवायु परिवर्तन का असर और बाजार में अस्थिरता ने उनकी स्थिति कमजोर कर दी है।

ऐसे में भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के बाद बढ़ती विदेशी प्रतिस्पर्धा उनके लिए नई चुनौती बनकर सामने आई है। किसान संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो FTA का असर लाखों बागवान परिवारों की आजीविका पर पड़ सकता है।

संतुलन की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि मुक्त व्यापार समझौते दीर्घकाल में व्यापार को बढ़ावा देते हैं, लेकिन संवेदनशील कृषि क्षेत्रों के लिए संतुलित नीति जरूरी है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लाभ और किसानों के हितों के बीच संतुलन बना रहे।

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