नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): महाराष्ट्र में किसान कर्जमाफी योजना का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गया है। देवेंद्र फडणवीस सरकार जल्द नई कर्जमाफी योजना लाने की तैयारी में है, लेकिन इससे पहले ही इसकी शर्तों और पात्रता को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। किसान संगठन इस मुद्दे पर पारदर्शिता की मांग करते हुए सरकार पर दबाव बना रहे हैं।
क्या है प्रस्तावित कर्जमाफी योजना
सरकार को हाल ही में प्रवीण परदेशी की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट सौंपी गई है, जिसके आधार पर नई योजना तैयार की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, इस योजना के तहत 30 सितंबर 2025 तक बकाया किसानों का अधिकतम 2 लाख रुपये तक का कर्ज माफ किया जा सकता है। इसके अलावा, जो किसान समय पर अपना कर्ज चुका चुके हैं, उन्हें 50 हजार रुपये तक का प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव रखा गया है।
इस पूरी योजना पर राज्य सरकार को लगभग 27 हजार करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं और अनुमान है कि इससे करीब 35 से 40 लाख किसानों को राहत मिलेगी। मुख्यमंत्री ने संकेत दिया है कि खरीफ सीजन से पहले ही इस योजना को लागू करने की कोशिश की जाएगी और ‘एग्री स्टैक’ तकनीक के जरिए लाभ सीधे किसानों तक पहुंचाया जाएगा।
शर्तों को लेकर क्यों बढ़ा विवाद

योजना को लेकर सबसे बड़ा विवाद पात्रता शर्तों पर है। शुरुआत में सरकार का विचार था कि इस बार केवल उन्हीं किसानों को कर्जमाफी का लाभ दिया जाए, जिन्हें पहले कभी इसका फायदा नहीं मिला। लेकिन बाद में इसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील मानते हुए इस विचार पर पुनर्विचार किया गया।
अब संभावना जताई जा रही है कि पिछली कर्जमाफी योजना के मानदंडों को ही फिर से लागू किया जाए। यही फैसला किसान संगठनों के विरोध का कारण बन गया है।
किसान संगठनों की मांग: कर्जमाफी योजना रिपोर्ट हो सार्वजनिक
अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने सरकार से मांग की है कि प्रवीण परदेशी समिति की कर्जमाफी योजना की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। संगठन के महासचिव डॉ. अजित नवले का कहना है कि किसानों को यह जानने का अधिकार है कि समिति ने किन आधारों पर सिफारिशें की हैं।
उनका तर्क है कि यदि पुरानी शर्तों को ही दोहराया गया, तो पिछली योजना में जिन किसानों को नुकसान हुआ था, वे फिर से वंचित रह जाएंगे। खासतौर पर पॉलीहाउस, शेड नेट, एमू फार्मिंग जैसे क्षेत्रों में लिए गए कर्ज पहले भी योजना से बाहर रखे गए थे।
आंदोलन की पृष्ठभूमि
पिछले साल अक्टूबर में कर्जमाफी को लेकर राज्य में बड़ा आंदोलन हुआ था। इस आंदोलन का नेतृत्व बच्चू कडू और राजू शेट्टी ने किया था। इसी आंदोलन के बाद सरकार ने परदेशी समिति का गठन किया था।
अब जब समिति अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी है, तो किसान संगठन यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि पुरानी शर्तों को ही लागू करना था, तो समिति बनाने की जरूरत क्यों पड़ी।
राज्य सरकार पर एक ओर किसानों को राहत देने का दबाव है, तो दूसरी ओर वित्तीय संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है। कर्जमाफी योजना की अंतिम रूपरेखा आने वाले दिनों में स्पष्ट होगी, लेकिन यह तय है कि बिना पारदर्शिता और स्पष्ट मानदंडों के इस योजना को लेकर विवाद थमने वाला नहीं है।
सरकार जल्द ही योजना की आधिकारिक घोषणा कर सकती है, लेकिन किसान संगठनों का रुख देखते हुए इसमें बदलाव की संभावना भी बनी हुई है।
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