नई दिल्ली, 10 फरवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): राजस्थान में सोलर ऊर्जा परियोजनाओं की आड़ में खेजड़ी की अंधाधुंध कटाई को लेकर राज्यव्यापी आंदोलन तेज होता जा रहा है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय समुदायों का आरोप है कि एक ओर वैज्ञानिक खेजड़ी की छंटाई तक को सीमित रखने की सलाह दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सोलर प्लांट और अन्य औद्योगिक परियोजनाओं के लिए इस जीवनदायी वृक्ष को बड़े पैमाने पर काटा जा रहा है।
बीकानेर संभाग के हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, चूरू, नागौर, जोधपुर, पाली, बाड़मेर और जैसलमेर सहित कई जिलों में “खेजड़ी बचाओ आंदोलन” के तहत धरने-प्रदर्शन लगातार जारी हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि बीते एक दशक में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर लाखों पेड़ काटे गए, जिनमें खेजड़ी जैसे परंपरागत और मरुस्थलीय पारिस्थितिकी के लिए बेहद अहम वृक्ष शामिल हैं।
आंदोलन क्यों हुआ तेज?
लगभग तीन दशक पहले खेजड़ी पर कीट प्रकोप का गंभीर असर पड़ा था, जिससे हजारों पेड़ सूख गए। हालांकि किसानों और सरकारी प्रयासों से स्थिति कुछ हद तक संभली, लेकिन हाल के वर्षों में सोलर प्लांट लगाने के लिए जमीन खाली कराने के नाम पर खेजड़ी की बड़े पैमाने पर कटाई ने हालात फिर बिगाड़ दिए।
पर्यावरण संघर्ष समिति के संयोजक रामगोपाल बिश्नोई का कहना है कि खेजड़ी आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। पहले कीटों ने नुकसान पहुंचाया और अब विकास परियोजनाओं के नाम पर इसे खत्म किया जा रहा है।
महापड़ाव और आमरण अनशन
बीकानेर के पॉलीटेक्निक कॉलेज परिसर में 2 फरवरी को हजारों लोगों ने महापड़ाव डालकर आंदोलन को नई धार दी। अगले दिन सैकड़ों लोगों ने आमरण अनशन शुरू किया, जिनकी संख्या बढ़कर 450 तक पहुंच गई। तीसरे दिन 17 अनशनकारियों की तबीयत बिगड़ गई, जिससे प्रशासन को अस्थायी अस्पताल तक बनाने पड़े।
इसके बाद सरकार की ओर से यह घोषणा की गई कि बीकानेर और जोधपुर संभाग में खेजड़ी की कटाई पर रोक लगाई जाएगी, लेकिन आंदोलनकारियों ने पूरे राज्य में प्रतिबंध की मांग पर अड़े रहते हुए आंदोलन जारी रखने का फैसला किया।
खेजड़ी क्यों है इतनी अहम?
| उपयोग/महत्व | विवरण |
|---|---|
| कृषि सहायक | खेतों के लिए प्राकृतिक खाद |
| पशुपालन | पशुओं के लिए प्रमुख चारा |
| आजीविका | सांगरी, गोंद और जलाऊ लकड़ी |
| पर्यावरण | मरुस्थलीय पारिस्थितिकी का संतुलन |
खेजड़ी को राजस्थान में ‘कल्पवृक्ष’ कहा जाता है। यह केवल राज्य वृक्ष नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का आधार है।
वैज्ञानिक चेतावनी बनाम जमीनी हकीकत
शोधों में सामने आया है कि खेजड़ी के क्षरण के पीछे जड़ सड़न, कीट प्रकोप, गिरता भूजल स्तर और गहरी जुताई जैसे कारण हैं। वैज्ञानिकों ने हर साल छंटाई से बचने की सलाह दी है, लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि इन सिफारिशों को नजरअंदाज कर सीधी कटाई की जा रही है।
अध्ययनों के मुताबिक, सौर संयंत्रों के आसपास का तापमान 4–5 डिग्री तक बढ़ जाता है और बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है, जो जल संकट झेल रहे राजस्थान के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
आंदोलन की एक ही मांग
बिश्नोई समाज और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने साफ कहा है कि वे विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन खेजड़ी की कीमत पर नहीं। उनकी मांग है कि पूरे राज्य में खेजड़ी की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगे और इसके संरक्षण के लिए सख्त कानून बनाया जाए।
आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानीं, तो आने वाले महीनों में यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।
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