नई दिल्ली, 22 जनवरी कृषि भूमि ब्यूरो): देश में भरपूर मानसून, फसल क्षेत्र के विस्तार और किसानों की बढ़ती मांग के चलते भारत का उर्वरक आयात इस वित्त वर्ष में रिकॉर्ड $18 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 76% अधिक होगा, जो भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में मांग के नए स्तर को दर्शाता है।
उद्योग और सरकारी सूत्रों के अनुसार, खासकर यूरिया और डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) के आयात में तेज़ बढ़ोतरी देखी जा रही है। इससे न केवल किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध होगा, बल्कि रबी और खरीफ दोनों मौसमों में फसल उत्पादन को भी मजबूती मिलेगी।
Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में भारत का उर्वरक आयात $13.98 बिलियन तक पहुंच चुका है, जो साल-दर-साल आधार पर 71% अधिक है। मार्च तिमाही में यूरिया और अन्य उर्वरकों की बड़ी खेप आने की संभावना है, जिस पर कम से कम $4 बिलियन का अतिरिक्त खर्च अनुमानित है।
तुलनात्मक रूप से देखें तो:
- पिछले वित्त वर्ष में उर्वरक आयात: $10.23 बिलियन
- 2022-23 में (रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद): $17.21 बिलियन
मानसून और खेती का सीधा असर
भारतीय पोटाश कंपनी के प्रबंध निदेशक पी.एस. गहलौत के अनुसार, कृषि गतिविधियों में तेज़ी और बेहतर मानसून के कारण इस वर्ष उर्वरक खपत कम से कम 5% बढ़ने का अनुमान है।
- जून–सितंबर मानसून वर्षा: औसत से 8% अधिक
- अक्टूबर वर्षा: 49% अधिक
इससे गेहूं, सरसों और चना जैसी रबी फसलों की बुवाई के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रही।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 1 अक्टूबर से अब तक 65.23 मिलियन हेक्टेयर में रबी फसलों की बुवाई हो चुकी है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 3.3% अधिक है।
उर्वरक एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष एस. संकरासुब्रमण्यम के मुताबिक, लगातार अच्छे मानसून और धान व मक्का की खेती के विस्तार से यूरिया की खपत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
आयात का अनुमान: आंकड़ों में तस्वीर
| उर्वरक | अनुमानित आयात (मिलियन मीट्रिक टन) | वार्षिक वृद्धि |
|---|---|---|
| यूरिया | 9.0 | 61% |
| डीएपी | 7.0 | 52% |
भारत मुख्य रूप से ओमान, रूस, चीन, सऊदी अरब और मोरक्को से यूरिया और डीएपी का आयात करता है। उर्वरक आयात में यह रिकॉर्ड बढ़ोतरी संकेत देती है कि भारतीय कृषि में उत्पादन बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में गतिविधियां तेज़ हैं। हालांकि, बढ़ता आयात बिल सरकार के सब्सिडी बोझ और विदेशी मुद्रा खर्च को भी बढ़ा सकता है—जिस पर नीति स्तर पर संतुलन साधना आने वाले समय की बड़ी चुनौती होगी।
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