पूसा (बिहार), 21 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (RPCAU), पूसा स्थित सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडीज ऑन क्लाइमेट चेंज में आज एक अत्याधुनिक एडी-कोवेरियंस टॉवर का उद्घाटन किया गया। यह सुविधा स्पेस एप्लिकेशन सेंटर (SAC), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के तकनीकी सहयोग से स्थापित की गई है।

यह टॉवर वायुमंडल और भूमि सतह के बीच गैसों एवं ऊर्जा के आदान-प्रदान, खासकर कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प और ऊष्मा का अत्यंत सटीक मापन करता है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को वैज्ञानिक रूप से समझने, कार्बन चक्र का आकलन करने और अनुकूलन व न्यूनीकरण रणनीतियाँ विकसित करने में यह तकनीक निर्णायक भूमिका निभाएगी।

32 प्रमुख पैरामीटर्स की रियल-टाइम निगरानी

एडी-कोवेरियंस टॉवर में उन्नत सेंसर और उपकरण लगाए गए हैं, जो मिट्टी, जल और वायु से जुड़े 32 महत्त्वपूर्ण पैरामीटर्स की निरंतर निगरानी करते हैं। इनमें प्रमुख हैं—

  • मिट्टी की नमी और तापमान
  • वायु तापमान व आर्द्रता
  • हवा की गति और दिशा
  • कार्बन डाइऑक्साइड व जलवाष्प फ्लक्स
  • संवेदनशील व अव्यक्त ऊष्मा फ्लक्स
  • नेट रेडिएशन और फोटोसिंथेटिकली एक्टिव रेडिएशन (PAR)
  • मिट्टी ऊष्मा फ्लक्स तथा मिट्टी श्वसन

उद्घाटन अवसर पर RPCAU के कुलपति डॉ. पी. एस. पांडेय ने कहा कि यह टॉवर विश्वविद्यालय के जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों में एक मील का पत्थर है। “यह सुविधा वायुमंडल, मिट्टी और वनस्पति के बीच जटिल अंतःक्रियाओं को समझने में मदद करेगी और जलवायु-प्रतिरोधी कृषि प्रणालियों के विकास को गति देगी,” उन्होंने कहा।

वहीं, RPCAU के निदेशक (अनुसंधान) डॉ. ए. के. सिंह ने बताया कि इस टॉवर से विभिन्न कृषि प्रणालियों की कार्बन सेक्वेस्ट्रेशन क्षमता का आकलन संभव होगा। “कार्बन सिंक बढ़ाने की रणनीतियाँ विकसित कर हम न केवल उत्सर्जन घटाने में योगदान देंगे, बल्कि कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता भी सुनिश्चित करेंगे,” उन्होंने कहा।

किसानों तक पहुँचेगा विज्ञान

इस सुविधा से प्राप्त डेटा के आधार पर जलवायु-स्मार्ट कृषि के लिए मॉडल और निर्णय-सहायक उपकरण विकसित किए जाएंगे। इससे किसानों को बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप फसल चयन, सिंचाई और प्रबंधन निर्णय लेने में सहायता मिलेगी।

उद्घाटन समारोह में RPCAU, SAC/ISRO सहित विभिन्न संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी और शोधकर्ता उपस्थित रहे। यह पहल क्षेत्र में स्थायी और वैज्ञानिक कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

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