नई दिल्ली, 09 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): भारत और अमेरिका के बीच जारी टैरिफ तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए लगातार रणनीतिक कदम उठा रहा है। इसी कड़ी में भारत ने पिछले एक साल के दौरान अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में अपना निवेश उल्लेखनीय रूप से घटाया है। यह कदम संकेत देता है कि भारत अब अपनी विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) रणनीति में बदलाव करते हुए ज्यादा डाइवर्सिफिकेशन यानी निवेश के नए विकल्पों पर जोर दे रहा है।

एक साल में अमेरिकी ट्रेजरी में 21% की गिरावट

ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के मुताबिक, 31 अक्टूबर 2024 से 31 अक्टूबर 2025 के बीच भारत की अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स में हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत कम हो गई। इस दौरान भारत का निवेश 241.4 अरब डॉलर से घटकर 190.7 अरब डॉलर रह गया। पिछले चार वर्षों में यह पहली बार है जब अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में भारत के निवेश में सालाना आधार पर गिरावट दर्ज की गई है। इससे पहले के वर्षों में यह निवेश या तो बढ़ता रहा था या लगभग स्थिर बना हुआ था।

आकर्षक यील्ड के बावजूद घटाया निवेश

यह गिरावट ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिकी बॉन्ड बाजार में रिटर्न काफी आकर्षक रहे। इस अवधि में 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी पर यील्ड 4.0 से 4.8 प्रतिशत के बीच रही, जो आमतौर पर विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र होती है। इसके बावजूद भारत द्वारा होल्डिंग कम करना इस बात की ओर इशारा करता है कि फैसला सिर्फ रिटर्न के आधार पर नहीं लिया गया, बल्कि इसके पीछे दीर्घकालिक रणनीतिक सोच है।

फॉरेक्स रिज़र्व को लेकर बदली सोच

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत अब अपने विदेशी मुद्रा भंडार को ज्यादा संतुलित और विविध बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दीपान्विता मजूमदार के अनुसार, यह कदम भारत की फॉरेक्स रिज़र्व मैनेजमेंट रणनीति में स्पष्ट बदलाव को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भारत अब अपने निवेश को केवल एक या दो एसेट क्लास तक सीमित रखने के बजाय अलग-अलग विकल्पों में फैलाने पर ध्यान दे रहा है।

डॉलर पर निर्भरता घटाने के संकेत

विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश घटाने का एक कारण डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीति भी हो सकती है। हाल के महीनों में अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) में कमजोरी देखी गई है, जिसका एक बड़ा कारण अमेरिका के रोजगार बाजार में सुस्ती के संकेत माने जा रहे हैं। इसके अलावा, अमेरिकी फेडरल रिज़र्व द्वारा भविष्य में ब्याज दरों में नरमी की संभावना भी डॉलर आधारित लंबी अवधि के निवेश को कम आकर्षक बना सकती है।

जियोपॉलिटिकल तनाव ने बढ़ाई चिंता

दुनियाभर में बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव, व्यापार विवादों और वित्तीय लेन-देन में बढ़ते बिखराव के चलते भारतीय रिज़र्व बैंक सहित कई केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार की संरचना की दोबारा समीक्षा कर रहे हैं। मौजूदा वैश्विक माहौल में केवल एक देश या एक मुद्रा पर निर्भर रहना जोखिम भरा माना जा रहा है।

सोना और अन्य विकल्प बने फोकस

मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार, भारत अब अपने फॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व का एक हिस्सा सोना, अन्य देशों के सरकारी बॉन्ड और डॉलर के अलावा अन्य मुद्राओं में लगाने पर विचार कर रहा है। विशेष रूप से सोना एक बार फिर सुरक्षित रिज़र्व एसेट के रूप में उभरकर सामने आया है, क्योंकि यह मुद्रा में उतार-चढ़ाव, महंगाई और वैश्विक राजनीतिक अस्थिरता के दौरान सुरक्षा प्रदान करता है।

कुलमिलाकर, मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक आने वाले समय में अपने सोने के भंडार में और बढ़ोतरी कर सकता है। यह कदम दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के उस ट्रेंड के अनुरूप होगा, जिसमें वे अपने गोल्ड रिज़र्व को मजबूत कर रहे हैं।

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