गोरखपुर, 21 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): Flow Bee Hive Technology in India – मधुमक्खी पालन करने वाले किसानों के लिए उत्तर प्रदेश से एक बड़ी और प्रेरणादायक खबर सामने आई है। गोरखपुर जिले के हरपुर गांव निवासी राजू सिंह ने एक अत्याधुनिक मशीन ‘फ्लो बी हाइव’ विकसित की है, जिसकी मदद से बिना बॉक्स खोले और बिना मधुमक्खियों को नुकसान पहुंचाए शुद्ध शहद निकाला जा सकता है।
इस अनोखे आविष्कार को तैयार करने में उनके इंजीनियर पुत्र आदर्श सिंह ने तकनीकी सहयोग दिया। हाल ही में इस नवाचार की सराहना योगी आदित्यनाथ ने भी की, जिससे यह तकनीक प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर के मधुमक्खी पालकों के बीच चर्चा का विषय बन गई है।
क्या है ‘फ्लो बी हाइव’ तकनीक
फ्लो बी हाइव तकनीक पर आधारित इस मशीन में एक विशेष चाबी (की) के माध्यम से शहद निकाला जाता है। जैसे ही चाबी घुमाई जाती है, फ्रेम के भीतर बनी आंशिक षट्कोणीय कोशिकाएं खुल जाती हैं और शहद गुरुत्वाकर्षण के कारण पाइप के जरिए सीधे जार या बोतल में बहने लगता है।
शहद निकालने की पूरी प्रक्रिया बिल्कुल नल खोलने जैसी सरल है। सबसे खास बात यह है कि इस दौरान मधुमक्खियां पूरी तरह सुरक्षित रहती हैं और उन्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती।
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5 से 10 मिनट में निकाला जाता है शहद
पारंपरिक तरीके से शहद निकालने में घंटों का समय, कई मजदूर और धुएं का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे मधुमक्खियों को नुकसान होता है। वहीं फ्लो बी हाइव तकनीक से एक किसान मात्र 5 से 10 मिनट में अकेले ही शहद निकाल सकता है। क्योंकि शहद सीधे छत्ते से निकलकर बोतल में आता है और हाथ नहीं लगता, इसलिए यह 100 प्रतिशत शुद्ध रहता है।
बॉक्स खोले बिना कैसे काम करती है मशीन
फ्लो बी हाइव बॉक्स के अंदर फूड-ग्रेड प्लास्टिक से बने विशेष फ्रेम होते हैं, जिन पर मधुमक्खियां प्राकृतिक मोम चढ़ाकर शहद भरती हैं। जब शहद पूरी तरह पक जाता है, तो मधुमक्खियां कोशिकाओं को मोम से सील कर देती हैं। यह संकेत होता है कि शहद निकालने के लिए तैयार है।
बॉक्स के बाहर बने स्लॉट में स्पेशल चाबी डालकर घुमाने पर कोशिकाएं हल्की-सी खिसक जाती हैं और उनके बीच बने चैनल से शहद नीचे की ओर बहने लगता है। शहद निकल जाने के बाद चाबी वापस घुमाने पर कोशिकाएं फिर अपनी मूल स्थिति में आ जाती हैं और मधुमक्खियां तुरंत दोबारा शहद भरना शुरू कर देती हैं।
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मधुमक्खियों को नहीं होता नुकसान
इस पूरी प्रक्रिया में बॉक्स खोलने या धुआं देने की जरूरत नहीं पड़ती। शहद निकालते समय मधुमक्खियां फ्रेम की सतह पर ही रहती हैं, जिससे उनके परेशान होने या मरने का खतरा न के बराबर हो जाता है। यही वजह है कि यह तकनीक बी-फ्रेंडली (Bee-Friendly) मानी जा रही है।
दो बक्सों से करोड़ों के कारोबार तक का सफर
राजू सिंह ने वर्ष 1992 में मधुमक्खी पालन की शुरुआत सिर्फ दो बक्सों से की थी। आज उनके पास करीब 1000 मधुमक्खी बक्से हैं और वे हर साल लगभग 350 क्विंटल शहद का उत्पादन करते हैं। मधुमक्खी पालन से वे करोड़ों रुपये का टर्नओवर कर रहे हैं और लाखों रुपये की सालाना आमदनी अर्जित कर रहे हैं।
शहद के अलावा उन्होंने मधुमक्खी बक्से, पराग (Pollen), प्रोपोलिस और रॉयल जेली जैसे उत्पादों का भी व्यवसाय विकसित किया है।
राष्ट्रीय पहचान बना चुके हैं राजू सिंह
बेहतर गुणवत्ता का शहद उत्पादन और किसानों को प्रशिक्षण देने के लिए राजू सिंह को राज्य स्तर पर कई सम्मान मिल चुके हैं। उन्हें मुख्यमंत्री और राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। आज वे सिर्फ एक किसान नहीं, बल्कि मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पहचान बना चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि फ्लो बी हाइव जैसी तकनीकें अगर बड़े स्तर पर अपनाई जाएं, तो इससे न सिर्फ किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि मधुमक्खियों का संरक्षण और शहद उत्पादन दोनों को नई दिशा मिलेगी।
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