दिल्ली की सीमाओं पर तीनों कृषि कानूनों को निरस्त किए जाने के बाद किसान एक बार फिर सड़कों पर हैं। इस बार उनकी मुख्य मांग एमएसपी पर कानून बनाने की है। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के आधार पर एमएसपी पर कानूनी गारंटी की मांग भी किसानों ने अपने पिछले विरोध प्रदर्शन के दौरान उठाई थी। लेकिन सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानी। हालांकि तब सरकार ने कृषि के लिए बनाए गए तीन कानूनों को निरस्त कर दिया था।

केंद्र सरकार ने तब न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के मुद्दों पर आगे विचार करने के लिए पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, लेकिन एमएसपी पर कानून नहीं बनाया गया है। अगर यह कानून बन जाता है तो इसका सीधा असर किसानों की फसल खरीदने वालों पर पड़ेगा, वे तय कीमत से नीचे फसल नहीं खरीद पाएंगे। हालांकि धान और गेहूं की खरीद सरकारी एजेंसियों द्वारा की जाती है, लेकिन बाकी फसलों की खरीद निजी कंपनियों के अलावा सरकार द्वारा की जाती है।

क्या है स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट

स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार को एमएसपी को उत्पादन की औसत लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक तक बढ़ाना चाहिए, जिसे सी2+ 50 प्रतिशत फॉर्मूला भी कहा जाता है। इसमें किसानों को 50 प्रतिशत रिटर्न देने के लिए पूंजी और भूमि पर किराए (जिसे “सी2” कहा जाता है) की अनुमानित लागत शामिल है। वहीं दिसंबर 2023 में राज्यसभा में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने कहा था कि सरकार ने जुलाई, 2022 में MSP समिति का गठन किया है जिसमें किसानों, केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, कृषि अर्थशास्त्रियों और वैज्ञानिकों आदि के प्रतिनिधि शामिल हैं।

सरकार सीएसीपी की सिफारिशों पर तय करती है एमएसपी

भारत सरकार कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा करती है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग एमएसपी का सुझाव देते समय विभिन्न कारकों को ध्यान में रखता है जिनमें समग्र मांग-आपूर्ति की स्थिति, उत्पादन लागत, घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मूल्य, अंतर-फसल मूल्य समानता, कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के बीच व्यापार की शर्तें और अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव शामिल हैं।

एमएसपी के बाद कारोबारियों और जनता पर पड़ेगा बोझ

असल में एमएसपी को लागू करने के बाद अनाज कारोबारियों और आम जनता पर सीधा बोझ पड़ेगा। वहीं जब कोई खरीदार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का भुगतान करने को तैयार नहीं होगा तो सरकार के पास बड़ी मात्रा में उपज को स्टोर करने के लिए आवश्यक भौतिक संसाधन नहीं हो सकते हैं। सरकार को खरीद और उन खरीदों को करने में तेजी की एक और चिंता का सामना करना पड़ सकता है। एमएसपी लागू करने से भारत के निर्यात प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि निजी व्यापारियों को एमएसपी पर खरीदने के लिए मजबूर करना मुश्किल हो सकता है।

बाजार में मांग के हिसाब से किसानों को होगा नुकसान

जानकारों का कहना है कि इस साल तुअर और उड़द समेत 5 खरीफ फसलों का बाजार मूल्य एमएसपी से ज्यादा रहा है। इस स्थिति में किसानों को एमएसपी की ही दरे मिल सकेंगी जबकि वो बाजार में महंगी कीमत पर अपने उत्पाद को बेच सकते हैं। वहीं वर्तमान में सोयाबीन और मूंगफली की मंडी कीमत बेंचमार्क दरों के बराबर है। जबकि मूंग, मक्का, रागी और बाजरा ऐसी खरीफ फसलें हैं, जो बेंचमार्क रेट से नीचे कारोबार कर रही हैं। इन फसलों पर एमएसपी से किसानों को फायदा होगा।

पिछले साल एमएसपी के ज्यादा थी कीमतें

जानकारों का कहना है कि पिछले साल, ज्वार, अरहर, कपास, उड़द और धान की अखिल भारतीय औसत कीमतें उनके एमएसपी के 5 से 38 प्रतिशत तक अधिक थीं। कर्नाटक में मक्का की कीमतें एमएसपी से अधिक थीं। हालांकि देश के अन्य हिस्सों में कीमतें एमएसपी से कम थी। इसका कारण क्वालिटी भी हो सकती है।

वहीं एमएसपी का समर्थन करने वाले जानकारों का कहना है कि अगर सरकार एमएसपी पर गारंटी देती है तो किसान धान और गेहूं की तुलना में अन्य फसलों को भी उगाने के लिए तैयार होंगे। क्योंकि जिन फसलों में एमएसपी मिल रही है। उन फसलों के अलावा सरकार कोई दूसरी फसल की तरफ नहीं जा रहे हैं।

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