Crude Oil 4 महीने की ऊंचाई पर, US-ईरान तनाव से बाजार में बढ़ी टेंशन

मुंबई, 28 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव ने एक बार फिर वैश्विक तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। कच्चे तेल की कीमतों में करीब 2% की तेजी देखने को मिली है और भाव 68 डॉलर प्रति बैरल के पार निकलकर चार महीने की ऊंचाई पर पहुंच गए हैं। बाजार में यह उछाल मुख्य रूप से रिस्क प्रीमियम के कारण आया है, जो संभावित सप्लाई बाधाओं को दर्शाता है।

जियोपॉलिटिकल टेंशन ने बढ़ाई बाजार की घबराहट

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान को लेकर दी गई नई चेतावनियों ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। ट्रंप ने साफ कहा है कि अगर ईरान न्यूक्लियर डील पर सहमत नहीं होता, तो मिलिट्री कार्रवाई की जा सकती है। इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में अशांति की आशंका फिर से गहराने लगी है।

इसी बीच, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड सितंबर के बाद अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया और पिछले सेशन में 1.3% की तेजी के साथ 64 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ।

होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा जोखिम

विशेषज्ञों के अनुसार अगर तनाव बढ़ता है, तो होर्मुज स्ट्रेट से तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। यह संकरा समुद्री रास्ता वैश्विक तेल सप्लाई के लगभग एक-तिहाई हिस्से के लिए बेहद अहम है। यहां किसी भी तरह की रुकावट से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।

ट्रेडर्स संभावित जोखिम से बचाव के लिए 14 महीनों में सबसे ऊंचे स्तर पर बुलिश कॉल ऑप्शन का प्रीमियम चुका रहे हैं। यह साफ संकेत है कि बाजार आगे और तेजी की आशंका को नजरअंदाज नहीं कर रहा।

इंवेस्टर्स के लिए एक्सपर्ट व्यू

कमोडिटी एनालिस्ट्स का मानना है कि शॉर्ट टर्म में क्रूड ऑयल में वोलैटिलिटी बनी रह सकती है। अगर मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है, तो कीमतें 70–75 डॉलर प्रति बैरल की ओर बढ़ सकती हैं। हालांकि, अमेरिका की बढ़ती सप्लाई और OPEC+ की रणनीति तेजी पर ब्रेक लगाने का काम कर सकती है। निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे स्टॉप लॉस के साथ ट्रेडिंग करें और केवल जियोपॉलिटिकल खबरों के आधार पर आक्रामक पोजीशन न लें।

भारत पर असर: पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ेंगी?

भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों, महंगाई, और सरकारी राजकोष पर पड़ सकता है।

अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो आने वाले हफ्तों में ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, सरकार टैक्स एडजस्टमेंट और तेल कंपनियों की रणनीति से फिलहाल असर को सीमित रखने की कोशिश कर सकती है।

कुल मिलाकर, क्रूड ऑयल की मौजूदा तेजी फंडामेंटल से ज्यादा जियोपॉलिटिकल रिस्क पर आधारित है। जब तक US-ईरान तनाव पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।

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