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बेर की फसल बचानी है तो पाउडरी मिल्ड्यू रोग को न करें नज़रअंदाज़

प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह
विभागाध्यक्ष, स्नातकोत्तर विभाग – पादप रोग विज्ञान एवं सूत्रकृमि विज्ञान
पूर्व सह निदेशक (अनुसंधान),  डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा

बेर (Ziziphus mauritiana), जिसे चीनी सेव या चीनी खजूर भी कहा जाता है, भारत के शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की एक प्रमुख फल फसल है। यह कठोर जलवायु परिस्थितियों में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है, इसलिए छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए आय का एक विश्वसनीय स्रोत मानी जाती है।

बेर के फल स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी होते हैं। इनमें विटामिन-C, विटामिन-A, पोटैशियम, आयरन, कैल्शियम तथा भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं। इसके नियमित सेवन से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, पाचन तंत्र सुदृढ़ होता है और हृदय व यकृत के स्वास्थ्य में भी सुधार होता है।

बेर की पत्तियाँ पौष्टिक पशु-चारे के रूप में उपयोगी हैं, जबकि इसकी लकड़ी ईंधन, बाड़बंदी और कृषि उपकरण निर्माण में काम आती है। इन्हीं कारणों से बेर को “गरीबों का सेब” भी कहा जाता है।

बेर की खेती में पाउडरी मिल्ड्यू रोग
बेर की व्यावसायिक खेती में पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery Mildew) एक गंभीर और विनाशकारी फफूंदजनित रोग है, जो मुख्यतः Oidium जाति की फफूंद द्वारा फैलता है। यह रोग विशेष रूप से फूल आने और फल विकास की अवस्था में अधिक नुकसान करता है।

यदि समय रहते इसका नियंत्रण न किया जाए, तो यह रोग 20 से 40 प्रतिशत तक उपज हानि कर सकता है। साथ ही फलों की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है, जिससे उनका बाजार मूल्य काफी गिर जाता है।

पाउडरी मिल्ड्यू रोग के प्रमुख लक्षण

  • प्रारंभिक लक्षण: रोग की शुरुआत में पत्तियों, कोमल टहनियों, पुष्पक्रम और नवगठित फलों पर सफेद चूर्ण जैसा पाउडर दिखाई देता है, जो धीरे-धीरे पूरे संक्रमित भाग को ढक लेता है।
  • पत्तियों पर प्रभाव: संक्रमित पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं, उनकी हरितिमा कम हो जाती है और वे समय से पहले झड़ने लगती हैं। इससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
  • फूलों एवं फलों पर प्रभाव: फूल संक्रमित होने पर फल-स्थापना घट जाती है। फलों पर सफेद परत बाद में भूरे या गहरे भूरे रंग में बदल जाती है। ऐसे फल विकृत, खुरदरे, फटे हुए और स्वाद में निम्न गुणवत्ता वाले हो जाते हैं।
  • रोग का जीवन-चक्र एवं प्रसार: फफूंद शीतकाल में कलियों और संक्रमित टहनियों में सुप्त अवस्था में जीवित रहती है। वसंत ऋतु में 24–26°C तापमान और 80–85% सापेक्ष आर्द्रता मिलने पर रोग तेजी से फैलता है। इसके बीजाणु हवा द्वारा दूर-दराज तक फैल जाते हैं।

 

रोग की रोकथाम के लिए क्या करें?
पाउडरी मिल्ड्यू रोग के प्रभावी नियंत्रण के लिए समेकित रोग प्रबंधन (IPM) अपनाना अत्यंत आवश्यक है। इसके तहत सबसे पहले रोकथाम संबंधी कृषि क्रियाओं पर ध्यान देना चाहिए। रोगग्रस्त टहनियों और पत्तियों की समय पर छंटाई कर उन्हें नष्ट करना चाहिए तथा पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए। खेत और बाग की नियमित सफाई जरूरी है और अत्यधिक नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग से बचना चाहिए, क्योंकि इससे रोग का प्रकोप बढ़ सकता है।

संतुलित सिंचाई से घटेगा रोग का खतरा
सिंचाई प्रबंधन में ओवरहेड सिंचाई से परहेज करना चाहिए और टपक सिंचाई (ड्रिप इरिगेशन) को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि पत्तियों पर नमी न ठहरे और बाग में अत्यधिक आर्द्रता न बने। उचित जल प्रबंधन से पाउडरी मिल्ड्यू के अनुकूल परिस्थितियों को रोका जा सकता है।

फफूंदनाशकों का छिड़काव
रासायनिक नियंत्रण के लिए फूल आने और फल लगने के तुरंत बाद पहला छिड़काव कैराथेन (डिनोकैप) 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी या घुलनशील गंधक 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से करना चाहिए। इसके बाद 15 दिन के अंतराल पर दूसरा छिड़काव किया जाए और यदि रोग का प्रकोप अधिक हो, तो फल तुड़ाई से लगभग 20 दिन पहले एक अतिरिक्त छिड़काव किया जा सकता है। छिड़काव हमेशा सुबह या शाम के समय करना चाहिए तथा दवाओं का अदल-बदल कर प्रयोग करना बेहतर रहता है।

जैविक एवं पर्यावरण-अनुकूल उपाय
इसके साथ ही जैविक और पर्यावरण-अनुकूल उपायों को भी अपनाया जा सकता है। Trichoderma harzianum या T. viride का प्रयोग, प्रारंभिक अवस्था में नीम तेल (0.5–1 प्रतिशत) का छिड़काव तथा जैव-फफूंदनाशकों का उपयोग रोग नियंत्रण में सहायक होता है।

रोग-प्रतिरोधी किस्में: दीर्घकालीन समाधान
दीर्घकालीन समाधान के रूप में जहाँ संभव हो, पाउडरी मिल्ड्यू सहनशील या प्रतिरोधी बेर किस्मों का चयन करना चाहिए, जिससे रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम हो और टिकाऊ उत्पादन सुनिश्चित किया जा सके।

बेर की सफल खेती का फार्मूला
बेर की खेती में पाउडरी मिल्ड्यू एक गंभीर चुनौती है, लेकिन समय पर पहचान, वैज्ञानिक प्रबंधन, संतुलित पोषण और समेकित रोग नियंत्रण रणनीति अपनाकर इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।

यदि किसान सुझाए गए उपायों को अपनाते हैं, तो वे न केवल अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं, बल्कि उच्च गुणवत्ता के फल उत्पादन कर बाजार में अधिक लाभ भी कमा सकते हैं। सतर्कता, समयबद्धता और वैज्ञानिक सोच—यही बेर की सफल खेती का फार्मूला है।


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