नई दिल्ली, 25 नवंबर (कृषि भूमि ब्यूरो): संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की नवंबर 2025 में जारी फूड आउटलुक रिपोर्ट इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि दुनिया 2025–26 में अनाज उत्पादन के मामले में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक वर्ष की ओर बढ़ रही है। गेहूं, चावल और मोटे अनाज—तीनों की वैश्विक पैदावार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की संभावना जताई गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह अनुकूल मौसम, कृषि तकनीक में हाल के वर्षों में हासिल सुधार, अधिक क्षेत्र में बुवाई और प्रमुख कृषि क्षेत्रों में सामान्य से बेहतर परिस्थितियाँ हैं।
इस रिपोर्ट ने वैश्विक खाद्य सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कीमतों और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालने वाले कई सुराग पेश किए हैं।
वैश्विक उत्पादन का परिदृश्य
FAO का अनुमान है कि दुनिया में 2025–26 के दौरान गेहूं का उत्पादन 819 मिलियन टन होगा, जो अब तक का सबसे अधिक स्तर है। चावल (मिल्ड बेसिस) का वैश्विक उत्पादन 556 मिलियन टन के रिकॉर्ड तक पहुंच सकता है, जबकि मोटे अनाज—जिनमें मक्का सबसे बड़ा घटक है—का कुल उत्पादन 1.61 बिलियन टन होने की संभावना है। यह वृद्धि सिर्फ संख्याओं का विस्तार नहीं है, बल्कि वैश्विक कृषि परिदृश्य की स्थिरता और क्षमता को दर्शाती है।
वैश्विक अनाज उत्पादन 2025–26
2025–26 में गेहूं का उत्पादन 819 मिलियन टन होगा, जो कृषि इतिहास में एक नया शिखर होगा। चावल का उत्पादन 556 मिलियन टन तक पहुँचेगा, जिसके पीछे एशिया और लैटिन अमेरिका में रिकॉर्ड फसलें प्रमुख भूमिका निभाएँगी। मोटे अनाजों का कुल उत्पादन 1.61 बिलियन टन रहेगा, जिसमें ब्राजील और अमेरिका की ऐतिहासिक मक्का पैदावार प्रमुख योगदान देगी।
वैश्विक स्टॉक स्थिति
गेहूं का स्टॉक 328.8 मिलियन टन तक पहुँचने की संभावना है, जो अब तक का उच्चतम स्तर है। चावल का वैश्विक भंडार भी 215 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर होगा। मोटे अनाजों का भंडारण भी स्थिर और मजबूत रहेगा, जिससे वैश्विक बाजार में आपूर्ति की स्थिति विशेष रूप से आरामदायक बनेगी।
खपत और व्यापार
गेहूं की वैश्विक खपत 808 मिलियन टन तक बढ़ सकती है, जिसमें एशिया और उत्तरी अमेरिका में जानवरों के चारे के रूप में बढ़ती मांग शामिल है। चावल की खपत मजबूत बनी रहेगी, जबकि व्यापार में थोड़ी गिरावट आ सकती है क्योंकि कई देशों में घरेलू उत्पादन अपनी आवश्यकताओं को पूरा करेगा। मोटे अनाजों का व्यापार 2.6 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है, जिसका सबसे बड़ा हिस्सा मक्का और जौ के अंतरराष्ट्रीय बाजार से आएगा।
FAO रिपोर्ट का विश्लेषण
1. गेहूं – खाद्य सुरक्षा के लिए सकारात्मक संकेत: FAO की रिपोर्ट के अनुसार 2025–26 में गेहूं उत्पादन में जो बढ़ोतरी दिख रही है, वह वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए एक सकारात्मक संकेत है। उत्पादन में वृद्धि मुख्यतः यूरोपीय संघ, भारत और रूस के बेहतर प्रदर्शन के कारण होगी। यूरोपीय देशों में मौसम सामान्य से बेहतर रहा, जिसके चलते गेहूं की बुवाई का क्षेत्र भी बढ़ा। इसी तरह भारत में आकर्षक कीमतें और कृषि नीतियों की स्थिरता ने किसानों को गेहूं की फसल का क्षेत्र बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। रूस में भी वसंत गेहूं की पैदावार अनुकूल मौसम की वजह से बेहतर होने की उम्मीद है।
हालाँकि कुछ देशों – जैसे ईरान, कज़ाखस्तान, पाकिस्तान और तुर्किये – में कम वर्षा के कारण उत्पादन दबाव में रहेगा, लेकिन इन देशों की कमी को EU, भारत और रूस जैसी बड़ी कृषि अर्थव्यवस्थाएँ पूरी कर देंगी। यही वजह है कि वैश्विक उत्पादन पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा और गेहूं का कुल उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर जाएगा।
खपत भी 808 मिलियन टन तक पहुँचने का अनुमान है, जिसमें जानवरों के आहार के रूप में गेहूं की बढ़ती मांग शामिल है। वैश्विक व्यापार 202 मिलियन टन तक बढ़ेगा, जिससे गेहूं का अंतरराष्ट्रीय बाजार सक्रिय और सजीव बना रहेगा। साथ ही गेहूं का भंडार 328.8 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर को छू सकता है, जो आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर स्थिरता सुनिश्चित करेगा।
2. चावल: एशिया और लैटिन अमेरिका का दबदबा
FAO के अनुसार चावल का उत्पादन 556 मिलियन टन तक पहुँच सकता है, और यह वृद्धि मुख्य रूप से एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों की सफल कृषि नीतियों और मौसम की अनुकूलता के कारण है। भारत, बांग्लादेश, चीन, इंडोनेशिया, वियतनाम और फिलीपींस जैसे देशों में मानसून सामान्य से बेहतर रहा है, जिससे चावल के क्षेत्र और उपज दोनों में वृद्धि हुई है।
लैटिन अमेरिका, विशेषकर ब्राजील और गयाना, ने भी पिछले वर्षों की तुलना में उच्च उत्पादकता हासिल की है। इन देशों में आधुनिक कृषि तकनीकों और सिंचाई सुविधाओं ने चावल उत्पादन को एक नए स्तर तक पहुँचाया है।
चावल की खपत स्थिर और मजबूत बनी रहेगी, लेकिन वैश्विक उत्पादन इतना अधिक होगा कि इससे अंतरराष्ट्रीय चावल भंडार 215 मिलियन टन का नया रिकॉर्ड बनाएगा। यह भंडार उन देशों के लिए महत्वपूर्ण होगा जो चावल आयात पर निर्भर हैं। व्यापार में हल्की गिरावट आ सकती है, क्योंकि कई एशियाई देशों का उत्पादन अपनी घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा।
3. मोटे अनाज: मक्का का ऐतिहासिक उछाल
मोटे अनाजों का उत्पादन 1.61 बिलियन टन रहने की उम्मीद है, और इस खंड में मक्का का योगदान सबसे अधिक है। ब्राजील और अमेरिका में मक्का की फसल ऐतिहासिक स्तर पर हो सकती है। दक्षिणी अफ्रीका में भी भारी बारिश के कारण ज्वार, जौ और अन्य मोटे अनाजों की उत्पादकता में सुधार हुआ है।
इन अनाजों की मांग दुनिया भर में बढ़ रही है, विशेष रूप से पशुपालन और जैव इंधन के क्षेत्रों में। खपत 157 करोड़ टन तक पहुँचने का अनुमान है। व्यापार में भी 2.6 प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद है, जिससे वैश्विक सप्लाई चैन मजबूत बनी रहेगी।
कौन आगे, कौन पीछे
1. यूरोपीय संघ (EU): EU इस बार गेहूं उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज करेगा। मौसम अनुकूल रहा और किसानों ने अधिक क्षेत्र में बुवाई की। इससे यूरोप अपनी वैश्विक निर्यात क्षमता को मजबूत करेगा।
2. रूस: रूस दुनिया के प्रमुख गेहूं निर्यातकों में से एक है। वसंत गेहूं की पैदावार अच्छी होने से रूस वैश्विक गेहूं बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा। काला सागर क्षेत्र की स्थिरता भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
3. भारत: भारत तीनों प्रमुख अनाजों में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बना हुआ है। गेहूं और चावल दोनों में रकबा बढ़ा है। घरेलू उत्पादन इतना मजबूत है कि देश आयात पर निर्भर नहीं रहेगा और PDS के लिए पर्याप्त भंडारण उपलब्ध रहेगा।
4. चीन: चीन अनाज उत्पादन में स्थिर है, परंतु उसकी विशाल आबादी के कारण खपत बहुत अधिक है। इसलिए चीन का आयात वैश्विक व्यापार के लिए निर्णायक भूमिका निभाता है।
5. ब्राजील: ब्राजील मक्का उत्पादन में ऐतिहासिक आंकड़े छुएगा। इससे वैश्विक मोटे अनाज उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी बढ़ेगी और व्यापार में वृद्धि होगी।
6. संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): अमेरिका मक्का और सोरघम का बड़ा उत्पादक है। इस वर्ष बारिश और मौसम अनुकूल रहे हैं, जिसके कारण उत्पादन में उल्लेखनीय उछाल देखने को मिल सकता है।
7. अफ्रीका: दक्षिणी अफ्रीका इस वर्ष सूखे की तुलना में बेहतर स्थिति में है। भारी वर्षा ने उत्पादन को बढ़ावा दिया है, और यह क्षेत्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए सकारात्मक है।
भारत पर प्रभाव – अवसर, चुनौतियाँ और स्थिति का मूल्यांकन
FAO की इस रिपोर्ट का भारत पर बहुआयामी प्रभाव पड़ेगा। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक है और वैश्विक खाद्य मूल्य निर्धारण में भी बड़ा कारक है। इस रिपोर्ट के बाद भारत की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय नीतियाँ दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
सबसे पहले, घरेलू स्तर पर खाद्य मुद्रास्फीति पर सकारात्मक असर मिलेगा। वैश्विक सप्लाई मजबूत रहने से भारत में गेहूं और चावल की कीमतों पर अत्यधिक दबाव नहीं पड़ेगा। उपभोक्ताओं के लिए यह राहत की खबर है। सरकार के सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के लिए भी यह स्थिति लाभदायक है क्योंकि अधिक भंडारण के कारण राशन योजनाओं में सप्लाई निर्बाध जारी रहेगी।
किसानों के लिए भी यह स्थिति मिश्रित प्रभाव लाती है। एक ओर उत्पादन बढ़ने से उन्हें अधिक उपज का फायदा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर वैश्विक कीमतें कम होने से निर्यात बाजारों में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। अगर भारत वैश्विक बाजार में गेहूं, चावल या मक्का बेचने की सोचता है, तो उसे अमेरिका, ब्राजील और EU जैसे बड़े देशों से कड़ी चुनौती मिलेगी।
निर्यात नीति पर भी इसका असर पड़ेगा। पिछले वर्षों में भारत ने चावल और गेहूं के निर्यात पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगाए थे, जिन्हें वैश्विक आपूर्ति मजबूत होने के बाद आंशिक रूप से हटाया जा सकता है। लेकिन यह निर्णय सरकार की खाद्य सुरक्षा रणनीति पर निर्भर करेगा।
खाद्य मुद्रास्फीति के साथ-साथ पशु चारे की कीमतों पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। जब मक्का जैसे मोटे अनाज सस्ते होंगे, तो डेयरी उद्योग और पोल्ट्री सेक्टर को राहत मिलेगी। दूध और अंडे की कीमतों पर भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर, FAO की यह रिपोर्ट भारत के लिए कीमतों, भंडारण और उपभोक्ताओं की दृष्टि से अनुकूल है, लेकिन किसानों और निर्यात के मोर्चे पर चुनौतीपूर्ण भी है।
FAO की नवंबर 2025 की फूड आउटलुक रिपोर्ट बताती है कि 2025–26 का वर्ष दुनिया के लिए खाद्यान्न उपलब्धता के लिहाज से स्थिरता और सुरक्षा लेकर आएगा। गेहूं, चावल और मोटे अनाज—तीनों के उत्पादन के रिकॉर्ड स्तर पर जाने से वैश्विक बाजारों में सप्लाई मजबूत रहेगी और कीमतों में अचानक उछाल की संभावना कम होगी।
भारत के लिए यह वर्ष अवसर भी है और चुनौती भी। अनाजों का बढ़ा हुआ उत्पादन घरेलू भंडारण, PDS और उपभोक्ताओं के लिए शुभ संकेत है। लेकिन वैश्विक कीमतों में स्थिरता और प्रतिस्पर्धात्मकता के कारण भारत को निर्यात नीति और किसान-सहायक उपायों पर अधिक ध्यान देना होगा।
यह रिपोर्ट न सिर्फ उत्पादक देशों, बल्कि उपभोक्ता देशों, अंतरराष्ट्रीय बाजार, वैश्विक खाद्य सुरक्षा और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालने वाली है। संपूर्ण खाद्यान्न परिदृश्य यह दर्शाता है कि दुनिया अगले कुछ वर्षों में खाद्य सुरक्षा के अपेक्षाकृत स्थिर दौर में प्रवेश कर सकती है।
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