नई दिल्ली, 29 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): चालू वित्त वर्ष में भारत के दाल बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, दालों का आयात करीब 30% घटकर 50 लाख टन (5 मिलियन टन) के आसपास रहने का अनुमान है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह आंकड़ा 73 लाख टन (7.3 मिलियन टन) था। पहली नजर में यह गिरावट बड़ी लगती है, लेकिन इसके बावजूद बाजार में आपूर्ति और कीमतों को लेकर फिलहाल कोई गंभीर खतरा नहीं दिख रहा।
आयात घटने की तीन बड़ी वजहें
इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन (IPGA) के चेयरमैन बिमल कोठारी के अनुसार, आयात में गिरावट के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं।
1. पुराना स्टॉक बचा होना: पिछले साल रिकॉर्ड आयात के चलते बाजार में पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, जिससे नई खरीद की जरूरत कम हुई है।
2. रुपये की कमजोरी: पिछले चार महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 7–8% कमजोर हुआ है, जिससे आयात महंगा हो गया है।
3. पीली मटर पर 30% शुल्क: सरकार द्वारा पीली मटर पर आयात शुल्क लगाए जाने से इसके आयात में भारी गिरावट आई है।
वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल–दिसंबर के बीच दालों का आयात मूल्य 33.33% घटकर 2.525 अरब डॉलर रह गया है, जो पिछले साल इसी अवधि में 3.788 अरब डॉलर था।
दालों के आयात का ट्रेंड (जनवरी–नवंबर 2025)
| दाल | आयात में बदलाव | मात्रा (लाख टन) |
|---|---|---|
| पीली मटर | ▼ 58% | 11.41 |
| तुअर | ▼ 7.71% | 10.54 |
| चना | ▲ 472% | 13.25 |
| उड़द | ▲ 42% | 9.86 |
| मसूर | ▲ 1.2% | 9.35 |
(स्रोत: IPGA)
महंगाई और आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
दालों के आयात में कमी और रुपये की कमजोरी के बावजूद आम उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल राहत बनी रहने की उम्मीद है। इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन के अनुसार, बाजार में सभी प्रमुख दालें अभी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे बिक रही हैं, जिससे कीमतों पर दबाव नहीं है। इसके अलावा, बाजार में पर्याप्त पुराना स्टॉक मौजूद है और घरेलू फसलों की स्थिति भी संतोषजनक बनी हुई है।
इन सभी कारकों को देखते हुए दालों की खुदरा कीमतों में अचानक या तेज उछाल की आशंका कम मानी जा रही है, जिससे आम आदमी पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ने की संभावना फिलहाल नहीं दिखती।
खेती से मिल रहा सपोर्ट
खेती के मोर्चे पर भी तस्वीर सकारात्मक है। रबी सीजन में दालों की बुवाई 3% बढ़कर 137.55 लाख हेक्टेयर हो गई है। चना बुवाई 5.11% बढ़कर 95.88 लाख हेक्टेयर और मसूर का रकबा 2.6% बढ़कर 18.12 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है। हालांकि, खरीफ 2025 के पहले अनुमान के मुताबिक दालों का कुल उत्पादन 74.13 लाख टन रह सकता है, जो पिछले साल से थोड़ा कम है।
कुल मिलाकर, दालों के आयात में गिरावट डिमांड-सप्लाई बैलेंस बिगाड़ने वाली नहीं है। मजबूत घरेलू स्टॉक, बढ़ी बुवाई और सरकारी नीतियों के चलते आम आदमी को महंगाई से राहत, किसानों को स्थिर बाजार, और सरकार को आयात निर्भरता घटाने में मदद मिलती दिख रही है।
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