Groundnut Smuggling: मलेशिया के रास्ते इंडोनेशिया पहुंच रही भारतीय मूंगफली, अवैध खेपों का जाल उजागर

नई दिल्ली / सिंगापुर, 13 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): भारतीय मूंगफली का निर्यात अब केवल व्यापार का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की कृषि गुणवत्ता, ट्रेसबिलिटी और अंतरराष्ट्रीय साख से जुड़ा गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार सूत्रों के मुताबिक, इंडोनेशिया द्वारा भारतीय मूंगफली पर लगाए गए कड़े नियमों के बावजूद, भारी मात्रा में खेपें मलेशिया के रास्ते अवैध रूप से इंडोनेशिया पहुंच रही हैं।

स्थिति यह है कि इंडोनेशिया में पहुंचने वाली कुल आयातित मूंगफली का बड़ा हिस्सा अब आधिकारिक चैनलों से नहीं, बल्कि तस्करी के जरिए आ रहा है। इससे न सिर्फ इंडोनेशिया के स्थानीय बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ा है, बल्कि भारत की कृषि निर्यात विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

प्रतिबंधों के बावजूद फल-फूल रहा अवैध आयात

नवंबर के अंत में इंडोनेशिया ने भारतीय मूंगफली पर लगा निलंबन भले ही हटा दिया हो, लेकिन गुणवत्ता और ट्रेसबिलिटी से जुड़े नियम अब भी बेहद सख्त हैं। इसके बावजूद व्यापार सूत्रों का दावा है कि करीब 90 प्रतिशत मूंगफली आयात अवैध रास्तों से हो रहा है।

सिंगापुर स्थित एक ट्रेड सूत्र के अनुसार, नवंबर महीने में इंडोनेशिया के डुमाई (Dumai) बंदरगाह पर 825 से ज्यादा कंटेनर अवैध रूप से पहुंचे, जबकि आधिकारिक पोर्ट्स से सिर्फ 80 कंटेनरों की ही एंट्री हुई। यह अंतर अवैध व्यापार के बढ़ते पैमाने को साफ तौर पर दिखाता है।

पोर्ट क्लांग बना तस्करी का मुख्य केंद्र

मलेशिया का पोर्ट क्लांग अब भारतीय मूंगफली की अवैध आवाजाही का सबसे बड़ा ट्रांजिट हब बन चुका है। भारत से भेजी गई मूंगफली पहले मलेशिया पहुंचती है और वहां से ट्रांजिट के नाम पर इंडोनेशिया भेज दी जाती है।

इस प्रक्रिया में मूंगफली को बार्ज और छोटी नावों के जरिए 20-20 कंटेनरों की खेप में डुमाई पोर्ट तक पहुंचाया जाता है। वहां से ट्रकों द्वारा जकार्ता और सुराबाया जैसे बड़े शहरों में सप्लाई की जाती है। इस पूरे नेटवर्क में न तो कोई वैध बिल होता है और न ही व्यापारिक दस्तावेज, जिससे माल की ट्रेसबिलिटी पूरी तरह खत्म हो जाती है। भुगतान नकद में होता है और इसमें हवाला नेटवर्क की भूमिका की भी आशंका जताई जा रही है।

थाईलैंड और चीन की सख्ती ने बढ़ाई मुश्किल

दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत के लिए हालात और चुनौतीपूर्ण होते जा रहे हैं। थाईलैंड ने जून 2025 से भारत से मूंगफली आयात पर रोक लगा दी है, जबकि चीन ने ASEAN देशों को गुणवत्ता जांच कड़ी करने और घरेलू किसानों से खरीद बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।

इसके चलते इंडोनेशिया ने स्वीकृत भारतीय निर्यातकों की संख्या घटाकर करीब 75 कर दी है, जबकि थाईलैंड ने केवल चुनिंदा एक्सपोर्टर्स को ही सीमित अनुमति दी है। व्यापार आंकड़े भी संदेह को और गहरा करते हैं। सितंबर 2025 तक भारत से मूंगफली का निर्यात कभी 6,500 टन से ऊपर नहीं गया था, लेकिन अक्टूबर के बाद अचानक बड़ा उछाल देखने को मिला।

मलेशिया को भारत से मूंगफली निर्यात

महीनानिर्यात (टन)
अक्टूबर8,300
नवंबर15,800
दिसंबर15,000

जबकि मलेशिया की सालाना कुल मूंगफली आयात जरूरत करीब 55,000 टन ही है। दिसंबर में इंडोनेशिया को आधिकारिक रूप से सिर्फ 20 कंटेनर भेजे गए, जबकि 225 कंटेनर अवैध रूप से पहुंचे।

अवैध आयात की वजह से इंडोनेशिया में मूंगफली की कीमतें गिरकर 30,000–32,000 इंडोनेशियाई रुपिया प्रति किलो रह गई हैं, जो पहले करीब 35,000 रुपिया थी। इन कीमतों में तस्करों और नाव संचालकों का लगभग 5,000 रुपिया प्रति किलो का कमीशन भी शामिल है।

अफ्लाटॉक्सिन: भारतीय मूंगफली की सबसे बड़ी चुनौती

भारतीय मूंगफली के लिए सबसे बड़ा संकट अफ्लाटॉक्सिन का स्तर बना हुआ है। इंडोनेशिया में स्वीकार्य सीमा 15 PPB है, जबकि भारत में यह 20 PPB तक मान्य है।

इस साल मानसून के दौरान सुखाने की प्रक्रिया में आई दिक्कतों के चलते कई खेपों में अफ्लाटॉक्सिन स्तर तय सीमा से 10 गुना तक ज्यादा पाया गया। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की उपज विशेष रूप से मानकों पर खरी नहीं उतर सकी, जिसके चलते हाल ही में एक भारतीय निर्यातक पर प्रतिबंध भी लगाया गया है।

क्षेत्रीय उद्योग भी संकट में

दक्षिण-पूर्व एशिया के बड़े कन्फेक्शनरी और फूड प्रोसेसिंग उद्योग इस स्थिति से बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। कई फैक्ट्रियों को रोजाना 100 टन मूंगफली की जरूरत होती है, लेकिन उनके पास सिर्फ 1–2 कंटेनर का ही स्टॉक बचा है। इसी आपूर्ति संकट ने अवैध नेटवर्क को और मजबूत किया है।

भारतीय मूंगफली का अवैध निर्यात अब केवल व्यापारिक नुकसान तक सीमित नहीं है। अगर अफ्लाटॉक्सिन नियंत्रण, ट्रेसबिलिटी सिस्टम और सरकारी निगरानी को जल्द मजबूत नहीं किया गया, तो भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों में लंबे समय तक भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है और उसकी कृषि निर्यात साख को गहरी चोट लग सकती है।

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