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डेज़र्टीफिकेशन के खिलाफ हंगरी के किसानों की लड़ाई: ‘वॉटर गार्डियंस’ बनकर बचा रहे हैं पानी और खेती

नई दिल्ली, 29 दिसंबर (कृषि भूमि ब्यूरो):  यूरोप को लंबे समय तक उपजाऊ और जल-संपन्न क्षेत्र माना जाता रहा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इस स्थिति को तेजी से बदल दिया है। हंगरी सहित मध्य यूरोप के कई इलाकों में वर्षा का पैटर्न अस्थिर हो गया है। कहीं लंबे सूखे तो कहीं अचानक भारी बारिश देखने को मिल रही है, जिससे मिट्टी की नमी और खेती दोनों प्रभावित हो रही हैं।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यह रुझान जारी रहा, तो हंगरी की बड़ी कृषि भूमि मरुस्थलीकरण की चपेट में आ सकती है।

बीते कुछ वर्षों में हंगरी के कई कृषि क्षेत्रों में भूजल स्तर तेजी से नीचे गया है। सिंचाई के पारंपरिक स्रोत सूखने लगे हैं और किसानों को गहराई तक पानी निकालने पर मजबूर होना पड़ रहा है। इससे न केवल लागत बढ़ी है, बल्कि छोटी जोत वाले किसानों के लिए खेती जोखिम भरा सौदा बनती जा रही है।

‘वॉटर गार्डियंस’ पहल: समस्या से समाधान तक

इसी संकट के बीच हंगरी के किसानों ने ‘Water Guardians’ नाम से एक जमीनी पहल शुरू की। इसका मूल विचार सरल है—बारिश के पानी को बहने देने के बजाय उसे खेतों और आसपास की जमीन में रोकना। किसान पुराने जलमार्गों को पुनर्जीवित कर रहे हैं, खेतों में छोटे जल-संग्रह क्षेत्र बना रहे हैं और प्राकृतिक जल प्रवाह को फिर से जगह दे रहे हैं।

इस पहल के असर अब जमीन पर दिखाई देने लगे हैं। खेतों में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, फसलें सूखे के दौरान भी बेहतर स्थिति में रहती हैं और सिंचाई पर निर्भरता कम हो रही है। किसानों का कहना है कि इससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ है और उत्पादन में स्थिरता आई है।

वैश्विक कृषि के लिए क्यों अहम है यह मॉडल

हंगरी के किसानों की यह पहल सिर्फ एक देश की कहानी नहीं है। भारत, अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में भी जल संकट और मरुस्थलीकरण खेती के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं। ऐसे में Water Guardians जैसा स्थानीय, कम लागत और किसान-नेतृत्व वाला मॉडल दुनिया भर के लिए सीख बन सकता है।

हंगरी के किसान यह साबित कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की लड़ाई सिर्फ नीतियों या तकनीक से नहीं, बल्कि ज़मीन से जुड़े समाधानों से जीती जा सकती है। पानी को बचाकर ही खेती सुरक्षित रह सकती है और यही सोच भविष्य की टिकाऊ कृषि की कुंजी है।

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