नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): सोयाबीन आयात – त्योहारों का मौसम नजदीक आते ही भारत में सोयाबीन तेल के आयात में जबरदस्त तेजी आने के आसार बन रहे हैं। घरेलू मांग में मजबूती और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण सूरजमुखी तेल की आपूर्ति में आए व्यवधान के चलते भारतीय रिफाइनर बड़े पैमाने पर सोयाबीन तेल की खरीद कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम कीमतों के कारण भी इसके आयात को बढ़ावा मिल रहा है, जिससे देश के कृषि बाजार में एक नई बहस छिड़ गई है।
अगस्त में रिकॉर्ड आयात का अनुमान
व्यापारिक अनुमानों के मुताबिक, अगस्त के दौरान देश में सोयाबीन तेल का कुल आयात 6.20 लाख टन के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच सकता है। यह आंकड़ा चालू तेल वर्ष के 4.25 लाख टन के मासिक औसत से करीब 46 प्रतिशत अधिक है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के अनुसार, सूरजमुखी तेल की तंगी के बीच सोयाबीन तेल एक मुख्य विकल्प बनकर उभरा है, लेकिन इसका सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ रहा है।
घरेलू मंडियों में सोयाबीन के गिरे दाम
एक ओर जहां आयात बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर घरेलू बाजार में सोयाबीन की कीमतें तेजी से नीचे आई हैं। पिछले कुछ दिनों के भीतर ही मध्य प्रदेश की प्रमुख मंडियों में सोयाबीन के भाव 300 से 400 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर चुके हैं।
किसान नेताओं के अनुसार, जो सोयाबीन कुछ दिन पहले तक 6,200 से 6,500 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा था, उसके भाव अचानक घटकर 5,600 से 5,800 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गए हैं। यह स्थिति तब है जब केंद्र सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 5,708 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। त्योहारी सीजन के दौरान कीमतों में तेजी की उम्मीद लगाए बैठे किसानों को औने-पौने दामों पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
नेपाल के रास्ते आयात और घटता रकबा
भारतीय रिफाइनिंग उद्योग के लिए नेपाल से आने वाला रिफाइंड सोयाबीन भी चिंता का विषय बना हुआ है। दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार समझौते (SAFTA) के तहत शून्य आयात शुल्क का लाभ उठाकर नेपाल से भारी मात्रा में रिफाइंड सोयाबीन तेल भारत आ रहा है।
इसके अलावा, चालू खरीफ सीजन में सोयाबीन के रकबे में भी गिरावट दर्ज की गई है। 21 अगस्त 2026 तक सोयाबीन का बुआई क्षेत्र पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 1.15 प्रतिशत घटकर 121.35 लाख हेक्टेयर पर सिमट गया है, जो इसके औसत रकबे से लगभग 7 लाख हेक्टेयर कम है। जानकारों का मानना है कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य न मिलना रकबा घटने का एक प्रमुख कारण है।
कुलमिलाकर, खाद्य तेलों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भरता लगातार बनी हुई है। हालांकि इससे तात्कालिक तौर पर मांग तो पूरी हो जाती है, लेकिन घरेलू तिलहन किसानों के हितों और देश को आत्मनिर्भर बनाने के दावों पर यह स्थिति गहरे सवाल खड़े करती है।