Rupee falls to all-time low: डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर, जानें गिरावट की वजह
नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): Rupee falls to all-time low: भारतीय रुपया बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। घरेलू मुद्रा शुरुआती कारोबार में 96.86 प्रति डॉलर पर खुली और कुछ ही देर में गिरकर 96.91 तक पहुंच गई। लगातार सात कारोबारी सत्रों से जारी कमजोरी ने निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।
रुपये में यह गिरावट ऐसे समय आई है जब वैश्विक वित्तीय बाजारों में अमेरिकी बॉन्ड यील्ड तेजी से बढ़ रही है, कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं और पश्चिम एशिया में जियोपॉलिटिकल तनाव लगातार बना हुआ है। इन सभी फैक्टर्स ने उभरते बाजारों की करेंसी पर दबाव बढ़ा दिया है।
पिछले सप्ताह रुपया करीब 1.6% टूटा था, जबकि इस सप्ताह भी यह अब तक लगभग 0.6% कमजोर हो चुका है। खास बात यह है कि पिछले सात ट्रेडिंग सेशन में से छह बार रुपये ने नया रिकॉर्ड निचला स्तर बनाया है।
US बॉन्ड यील्ड में तेजी से बढ़ा दबाव
विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेज उछाल रुपये की कमजोरी की सबसे बड़ी वजहों में शामिल है। निवेशकों को अब यह आशंका सताने लगी है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकता है।
पिछले चार कारोबारी सत्रों में 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड 20 बेसिस पॉइंट से अधिक बढ़ चुकी है। वहीं 30 साल की बॉन्ड यील्ड 2007 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है।
जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो ग्लोबल निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी एसेट्स की ओर रुख करते हैं। इसका सीधा असर भारतीय रुपये जैसी करेंसी पर पड़ता है।

कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने बढ़ाई चिंता
रुपये की कमजोरी के पीछे दूसरा बड़ा कारण कच्चे तेल की लगातार ऊंची कीमतें हैं। बुधवार को ब्रेंट क्रूड लगभग 111 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने पर देश की डॉलर डिमांड बढ़ जाती है। तेल कंपनियों को ज्यादा डॉलर खरीदने पड़ते हैं, जिससे विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव बनता है और रुपया कमजोर होता है।
इसके अलावा महंगे तेल से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट भी बढ़ता है, जो लंबी अवधि में रुपये के लिए नकारात्मक माना जाता है।
जियोपॉलिटिकल तनाव का असर
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान विवाद ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ने पर निवेशक सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर की तरफ भागते हैं।
इसी वजह से डॉलर इंडेक्स मजबूत बना हुआ है, जबकि एशियाई मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा हालात में रुपया एशिया की कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी में शामिल हो गया है।
एक्सपर्ट्स क्या कह रहे हैं?
Rupee falls to all-time low: एक प्रमुख बैंक के करेंसी ट्रेडर के मुताबिक, “रुपया पहले ही ऊंचे तेल कीमतों के हिसाब से काफी एडजस्ट कर चुका था, लेकिन अब अमेरिकी ब्याज दरों में बदलाव की आशंका के चलते इसकी नई री-प्राइसिंग हो रही है।”
कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी के फिक्स्ड इनकम हेड अभिषेक बिसेन का कहना है कि ईरान विवाद शुरू होने के बाद से रुपया करीब 5% कमजोर हो चुका है, जबकि पिछले एक साल में इसमें लगभग 11% की गिरावट आई है।
उनके मुताबिक रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट के आधार पर रुपया फिलहाल अंडरवैल्यूड नजर आता है, लेकिन शॉर्ट टर्म में इसकी चाल पूरी तरह तेल की कीमतों और बाहरी बाजार संकेतों पर निर्भर करेगी।
आगे किन फैक्टर्स पर रहेगी नजर?
बाजार की नजर अब तीन प्रमुख फैक्टर्स पर बनी रहेगी—
- कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव
- पश्चिम एशिया के जियोपॉलिटिकल घटनाक्रम
- अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति
यदि तेल की कीमतों में और तेजी आती है या अमेरिकी फेड सख्त रुख अपनाता है, तो रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है। वहीं किसी सकारात्मक वैश्विक संकेत या RBI के हस्तक्षेप से घरेलू मुद्रा को कुछ राहत मिल सकती है।
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