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Onion Price Crash: प्याज के दाम लागत से नीचे, युद्ध और निर्यात बाधा से गहराया किसान संकट

Onion Price Crash

Onion Price Crash: युद्ध की मार – निर्यात ठप, घरेलू बाजार में दाम टूटे

नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): भारत में प्याज की कीमतों में आई गिरावट (Onion Price Crash) अब सिर्फ एक बाजार घटना नहीं, बल्कि गहराते ग्रामीण संकट की कहानी बन चुकी है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, खासकर ईरान से जुड़े संघर्ष, ने भारतीय प्याज निर्यात को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसका सीधा असर घरेलू मंडियों में दिख रहा है, जहां किसानों को उनकी उत्पादन लागत से भी कम कीमत मिल रही है।

महाराष्ट्र की लासलगांव APMC, जो दुनिया की सबसे बड़ी प्याज मंडियों में गिनी जाती है, में 9 से 15 अप्रैल के बीच औसत कीमत ₹1,098 प्रति क्विंटल दर्ज की गई। यह स्तर किसानों की लागत के मुकाबले काफी कम है, जो कई मामलों में ₹1,500 से ₹2,200 प्रति क्विंटल तक बताई जा रही है।

मामूली सुधार, लेकिन संकट बरकरार

पिछले दो हफ्तों में कीमतों में हल्का सुधार जरूर देखने को मिला है, जिसका कारण सरकारी खरीद और कुछ वैकल्पिक बाजारों—जैसे मलेशिया और श्रीलंका—को निर्यात है। लेकिन खाड़ी देशों को निर्यात अभी भी बाधित है, जिससे बाजार में आपूर्ति अधिक और मांग सीमित बनी हुई है।

Onion Price Crash 2026
Onion Price Crash

महाराष्ट्र की अन्य मंडियों में भी यही तस्वीर दिखती है। जामखेड़ में दाम ₹600 प्रति क्विंटल तक गिर गए, जबकि कामठी मंडी में एक महीने में 22% से ज्यादा गिरावट दर्ज की गई। यह असमानता बताती है कि बाजार अभी भी अस्थिर है।

Onion Price Crash: लागत से नीचे बिक्री का दबाव

किसान संगठनों का कहना है कि मौजूदा स्थिति में प्याज की खेती घाटे का सौदा बन गई है। स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के नेता राजू शेट्टी के मुताबिक, कुछ समय पहले किसानों को ₹900 प्रति क्विंटल तक के दाम मिल रहे थे—जो लागत से काफी नीचे है।

दूसरी ओर, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के नेता जयंत पाटिल ने भी इसे “आर्थिक संकट” बताते हुए कहा कि किसान दोहरी मार झेल रहे हैं—एक तरफ निर्यात ठप है, दूसरी तरफ बेमौसम बारिश से फसल प्रभावित हुई है।

आंकड़ों में गिरावट की पुष्टि

Onion Price Crash: सरकारी आंकड़े भी इस संकट की पुष्टि करते हैं। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, मार्च 2026 में प्याज की थोक कीमतें सालाना आधार पर 42% से अधिक नीचे रहीं। पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में औसतन कीमतों में 47% की गिरावट दर्ज की गई।

हालिया ट्रेंड साफ दिखाई देता है:

अवधिऔसत कीमत (₹/क्विंटल)बदलाव
अप्रैल 2025~1100
मार्च 2026~927गिरावट
अप्रैल 2026 (वर्तमान)~1098मामूली सुधार

खुदरा स्तर पर भी उपभोक्ताओं को राहत मिली है, जहां कीमतें ₹25 प्रति किलो से नीचे बनी हुई हैं।

नीति हस्तक्षेप की मांग तेज

किसान संगठनों ने सरकार से तत्काल कदम उठाने की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगों में निर्यात सब्सिडी बढ़ाना, सरकारी खरीद का दायरा बढ़ाना और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करना शामिल है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक निर्यात चैनल पूरी तरह सामान्य नहीं होते, तब तक घरेलू बाजार में कीमतों का दबाव बना रहेगा। खासकर होर्मुज स्ट्रेट जैसे रणनीतिक मार्गों में तनाव के चलते शिपिंग लागत बढ़ गई है, जिससे खाड़ी देशों को निर्यात महंगा पड़ रहा है।

आगे क्या?

आने वाले हफ्तों में रबी फसल की आवक बढ़ने वाली है, जिससे कीमतों पर और दबाव आ सकता है। यदि सरकार ने समय पर हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह संकट और गहरा सकता है।

यह स्थिति एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती है—क्या भारत का कृषि बाजार वैश्विक झटकों को झेलने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है? फिलहाल, जवाब नकारात्मक दिखता है, और इसकी सबसे बड़ी कीमत किसान चुका रहे हैं।

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