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कपास के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई पर, CCI ने नए सीजन की बिक्री शुरू की; भाव ₹56,000 प्रति कैंडी के पार

नई दिल्ली, 20 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): घरेलू कपास बाजार इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। 2025-26 सीजन में कपास के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं और ₹56,000 प्रति कैंडी (356 किलोग्राम) के स्तर को पार कर गए हैं। इसी पृष्ठभूमि में भारतीय कपास निगम (CCI) ने सोमवार से नए सीजन के लिए कपास की बिक्री शुरू कर दी है। बाजार के जानकारों का मानना है कि यह कदम आने वाले हफ्तों में कीमतों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

CCI की बिक्री: बाजार में सप्लाई का संकेत

CCI के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक ललित कुमार गुप्ता के अनुसार, स्पिनिंग मिलों को अच्छी गुणवत्ता वाली कपास की तत्काल जरूरत को देखते हुए बिक्री शुरू की गई है। पहले ही दिन करीब 1.14 लाख गांठों का सौदा हुआ, जो यह दर्शाता है कि ऊंचे भाव के बावजूद मांग बनी हुई है। इसमें 61,000 गांठें 2025-26 की नई फसल से मिलों ने खरीदीं, जबकि 51,400 गांठें व्यापारियों के हिस्से में गईं।

पिछले सप्ताह तक CCI द्वारा करीब 82 लाख गांठों की खरीद पूरी कर लिया जाना इस बात का संकेत है कि सरकारी एजेंसी के पास बाजार को नियंत्रित करने की पर्याप्त क्षमता मौजूद है।

CCI के तय दाम और बाजार की प्रतिक्रिया

CCI ने 29 एमएम कपास के लिए ₹56,300 से ₹57,300 प्रति कैंडी का बिक्री मूल्य तय किया है। यह दरें भले ही पिछले साल के स्तर के आसपास हों, लेकिन मौजूदा खुले बाजार भाव से तुलना करें तो कुछ ऊंची मानी जा रही हैं। यही वजह है कि बाजार में इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अतुल गंतरा का कहना है कि CCI के दाम बाजार की अपेक्षा से ₹1,000 से ₹1,500 प्रति कैंडी अधिक हैं। उनके मुताबिक, आगे की बिक्री पूरी तरह कपास की गुणवत्ता पर निर्भर करेगी। यदि गुणवत्ता मिलों की जरूरत के अनुरूप रही, तो CCI को माल निकालने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। लेकिन गुणवत्ता कमजोर होने की स्थिति में मिलें आयातित कपास की ओर रुख कर सकती हैं, भले ही उसकी लागत ₹58,000–₹59,000 प्रति कैंडी तक क्यों न पहुंच जाए।

मिलों की रणनीति: फिलहाल सीमित खरीद

दक्षिण भारत के प्रमुख कपास व्यापार केंद्रों से जुड़े वरिष्ठ सोर्सिंग एजेंट शेखर रेड्डी का कहना है कि मौजूदा ऊंचे भाव स्थायी नहीं माने जा रहे हैं। उनके अनुसार, मिलें इस समय केवल अपनी तात्कालिक जरूरत के हिसाब से ही खरीदारी कर रही हैं और बड़े स्टॉक बनाने से बच रही हैं। उनका मानना है कि ₹54,000 से ₹55,000 प्रति कैंडी का स्तर बाजार के लिए अधिक संतुलित रहता।

यह रुख इस बात की ओर इशारा करता है कि मिलें अभी कीमतों में नरमी की उम्मीद लगाए बैठी हैं और CCI की अगली बिक्री नीति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

क्यों रिकॉर्ड पर पहुंचे कपास के दाम

मौजूदा सीजन में कपास की कीमतों में आई तेजी के पीछे कई कारक काम कर रहे हैं। अक्टूबर में सीजन की शुरुआत के समय भाव करीब ₹52,000 प्रति कैंडी थे, जो जनवरी से तेजी से बढ़ने लगे। 31 दिसंबर को सरकार द्वारा कपास आयात पर दी गई शुल्क छूट खत्म किए जाने के बाद घरेलू बाजार को मजबूत सहारा मिला।

इसके साथ ही बिनौला की कीमतों में मजबूती ने जिनिंग फैक्ट्रियों पर दबाव बनाए रखा, जिससे कच्चे कपास के दाम नीचे आने की गुंजाइश कम हो गई। अच्छी गुणवत्ता वाली लंबी स्टेपल कपास की सीमित उपलब्धता ने भी प्रीमियम सेगमेंट में कीमतों को ऊंचा बनाए रखा है।

उत्पादन बढ़ा, लेकिन राहत सीमित

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने 2025-26 के लिए कपास उत्पादन अनुमान को 2.5 प्रतिशत बढ़ाकर 317 लाख गांठ कर दिया है। महाराष्ट्र और तेलंगाना में उम्मीद से बेहतर पैदावार इसकी मुख्य वजह रही है। इसके बावजूद बाजार में कीमतों पर तत्काल दबाव नहीं दिख रहा है, क्योंकि मिलों की मांग विशिष्ट गुणवत्ता और ग्रेड तक सीमित है।

रिकॉर्ड आयात के बावजूद ऊंचे भाव

इस सीजन में कपास का आयात भी रिकॉर्ड स्तर पर रहने का अनुमान है। एसोसिएशन के मुताबिक, आयात 50 लाख गांठ तक पहुंच सकता है, जबकि पिछले साल यह 41 लाख गांठ था। 31 दिसंबर तक ही 31 लाख गांठों का आयात हो चुका है। इसके बावजूद आयातित कपास महंगी पड़ने, डॉलर के मजबूत रहने और ऊंची फ्रेट लागत के कारण घरेलू बाजार पर इसका असर सीमित ही रहा है।

सीजन के अंत में 122.59 लाख गांठों के सरप्लस स्टॉक की संभावना जरूर जताई जा रही है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसका दबाव बाजार पर सीजन के अंतिम चरण में ही दिखाई देगा।

आगे बाजार का रुख क्या होगा

विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले चार से छह हफ्ते कपास बाजार के लिए निर्णायक होंगे। यदि CCI बिक्री में लचीलापन दिखाता है तो कीमतों में स्थिरता आ सकती है। वहीं, वैश्विक बाजार मजबूत रहने की स्थिति में कपास के भाव ₹57,000 से ₹58,000 प्रति कैंडी तक भी जा सकते हैं। फिलहाल बाजार पूरी तरह से CCI की रणनीति, गुणवत्ता की वास्तविक स्थिति और आयात के रुख पर निर्भर करता नजर आ रहा है।

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