श्रीनगर, 4 दिसंबर, 2025 ( कृषि भूमि डेस्क): पूरी दुनिया में अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सेब के बागानों के लिए मशहूर कश्मीर घाटी इस समय एक गंभीर चुनौती का सामना कर रही है—भयंकर सूखा। सूखे की इस आपदा ने न केवल कश्मीर की हरी-भरी छवि को धूमिल किया है, बल्कि यहाँ के किसानों की आजीविका पर भी गहरा संकट खड़ा कर दिया है।
70% तक फसलें हुईं बर्बाद
सरकारी आंकड़ों और किसानों के अनुभव के अनुसार, घाटी में सूखे के कारण इस मौसम में 70 प्रतिशत तक फसलें बर्बाद हो चुकी हैं। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि कश्मीर की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा कृषि, खासकर बागवानी (Horticulture) पर निर्भर है। सेब, नाशपाती और अखरोट जैसे नकदी फसलों के बागान बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। पानी की कमी के कारण फल या तो छोटे रह गए हैं, या फिर समय से पहले ही झड़ गए हैं। घाटी में धान (चावल) की खेती के लिए भरपूर पानी की आवश्यकता होती है। मानसून की बेरुखी और सिंचाई के साधनों की कमी के कारण धान के खेतों में दरारें पड़ गई हैं, जिससे पैदावार में भारी गिरावट आई है। आलू, टमाटर और अन्य मौसमी सब्जियों की फसलें भी सूखे की चपेट में आने से खराब हो गई हैं, जिससे स्थानीय बाज़ारों में कीमतों में उछाल आने की आशंका है।
अगले सीज़न पर भी मंडरा रहा खतरा
वर्तमान सूखे का असर केवल मौजूदा फसल तक सीमित नहीं है। किसानों की चिंता यह है कि अगले कृषि सीज़न के लिए भी खतरा मंडरा रहा है। लंबे समय तक पानी की कमी के कारण मिट्टी की नमी (Soil Moisture) खतरनाक स्तर तक कम हो गई है। इसका सीधा असर अगले सीज़न की बुआई पर पड़ेगा। घाटी में पानी के प्राकृतिक स्रोत, जैसे झरने, नाले और कुएं, सूख गए हैं या उनका जल स्तर काफी नीचे चला गया है। अगर सर्दियों में पर्याप्त बर्फबारी नहीं हुई, तो आने वाली गर्मियों में सिंचाई के लिए पानी मिलना असंभव हो जाएगा। फलदार पेड़ों को अगले सीज़न में अच्छी पैदावार देने के लिए सर्दियों के दौरान पर्याप्त नमी की ज़रूरत होती है। सूखे के कारण पेड़ों का स्वास्थ्य खराब हो रहा है, जिसका परिणाम अगले साल की फलत पर दिखाई देगा।
आसमान की ओर टकटकी लगाए किसान
हालात इतने विकट हैं कि अब किसान पूरी तरह से आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। उनकी एकमात्र उम्मीद अब समय पर बारिश और अच्छी बर्फबारी पर टिकी है। किसान सरकार से तत्काल राहत पैकेज, बिजली बिलों में छूट, और सिंचाई के वैकल्पिक साधनों को मजबूत करने की मांग कर रहे हैं। कुछ किसान संकट से निपटने के लिए पारंपरिक जल संचयन (Water Harvesting) तकनीकों को फिर से अपना रहे हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर यह पर्याप्त नहीं है।
कश्मीर का यह सूखा संकट न केवल एक पर्यावरण समस्या है, बल्कि यह क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए भी एक गंभीर चुनौती है। सरकार और समाज को मिलकर इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान खोजना होगा ताकि ‘धरती का स्वर्ग’ एक बार फिर हरा-भरा और समृद्ध बन सके।
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