नई दिल्ली (कृषि भूमि ब्यूरो): ड्राफ्ट गन्ना नियंत्रण आदेश 2026: केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 को लेकर देशभर में गन्ना किसानों, किसान संगठनों और गुड़-खांडसारी उद्योग के बीच विरोध तेज हो गया है। अखिल भारतीय गन्ना किसान फेडरेशन (AISFF) ने सरकार से इस ड्राफ्ट को किसान हितैषी बनाने की मांग करते हुए कई महत्वपूर्ण संशोधनों का सुझाव दिया है।
फेडरेशन ने प्रस्तावित गन्ना नियंत्रण आदेश में उचित एवं पारिश्रमिक मूल्य (FRP) को 10.25 प्रतिशत चीनी रिकवरी दर के आधार पर तय करने के प्रावधान का कड़ा विरोध किया है। संगठन का कहना है कि देश के कई प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में औसत रिकवरी दर 9.5 प्रतिशत से कम रहती है, ऐसे में 10.25 प्रतिशत का मानक किसानों के साथ अन्याय होगा। संगठन ने मांग की है कि FRP की गणना 9.5 प्रतिशत रिकवरी दर के आधार पर की जाए।
स्वामीनाथन फॉर्मूला लागू करने की मांग
AISFF ने कहा कि गन्ने का मूल्य निर्धारण स्वामीनाथन आयोग के C2+50% फार्मूले के आधार पर होना चाहिए। इसके तहत किसानों को उनकी कुल लागत पर कम से कम 50 प्रतिशत लाभ सुनिश्चित किया जाना चाहिए। संगठन का आरोप है कि ड्राफ्ट गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 में एथेनॉल उत्पादन और चीनी उद्योग को बढ़ावा देने पर अधिक जोर दिया गया है, जबकि किसानों और कृषि मजदूरों की वास्तविक समस्याओं की अनदेखी की गई है।
फेडरेशन का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के कारण चीनी मिलों की आय में काफी वृद्धि हुई है। मिलों को एथेनॉल, बिजली उत्पादन और अन्य सह-उत्पादों से अतिरिक्त मुनाफा मिल रहा है, लेकिन इस लाभ में किसानों की कोई हिस्सेदारी तय नहीं की गई है।
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एथेनॉल और सह-उत्पादों में हिस्सेदारी की मांग
संगठन ने मांग की है कि एथेनॉल, बिजली और उर्वरक जैसे सह-उत्पादों से होने वाले अतिरिक्त लाभ का 50 प्रतिशत हिस्सा किसानों और कृषि मजदूरों को दिया जाए। AISFF के अनुसार, गन्ना उत्पादन करने वाले किसान एथेनॉल आधारित अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े हितधारक हैं, लेकिन उन्हें इसका आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा।
देश में वर्ष 2025-26 के दौरान लगभग 57.35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती होने का अनुमान है। इस क्षेत्र से जुड़े करीब 67.7 लाख कृषि मजदूर खेती, कटाई और परिवहन कार्यों में लगे हैं। संगठन का कहना है कि 55.7 लाख पंजीकृत गन्ना किसानों में अधिकांश छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास एक हेक्टेयर से कम भूमि है।
भुगतान में देरी और दूरी नियम पर विवाद
ड्राफ्ट गन्ना नियंत्रण आदेश 2026: AISFF ने चीनी मिलों द्वारा गन्ना भुगतान में देरी को गंभीर मुद्दा बताया है। संगठन का कहना है कि कानून के तहत 14 दिनों में भुगतान का प्रावधान होने के बावजूद किसानों को समय पर पैसा नहीं मिलता। डिजिटल भुगतान व्यवस्था लागू होने के बावजूद हजारों करोड़ रुपये का बकाया बना हुआ है। संगठन ने देरी से भुगतान पर ब्याज और जवाबदेही तय करने की मांग की है।
इसके अलावा दो चीनी मिलों के बीच न्यूनतम दूरी 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने के प्रस्ताव का भी विरोध किया गया है। किसान संगठनों का कहना है कि इससे बड़ी चीनी मिलों का एकाधिकार बढ़ेगा और किसानों की सौदेबाजी क्षमता कमजोर होगी।
केंद्र सरकार ने किसानों से चर्चा का दिया भरोसा
इस बीच केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 पर कोई अंतिम फैसला किसानों और संबंधित पक्षों से विस्तृत चर्चा के बाद ही लिया जाएगा। पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान के नेतृत्व में किसान प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को मंत्री से मुलाकात कर अपनी चिंताएं रखीं।
बैठक में गुड़ और खांडसारी उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों ने भी प्रस्तावित आदेश का विरोध किया। उनका कहना है कि नए प्रावधानों से छोटे गुड़ और खांडसारी उद्योगों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो सकता है। उन्होंने मांग की कि वर्तमान लाइसेंसिंग व्यवस्था जारी रखी जाए और इन इकाइयों पर अतिरिक्त नियंत्रण न लगाए जाएं।
विशेषज्ञों का मानना है कि गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 आने वाले समय में देश की चीनी और एथेनॉल अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगा। ऐसे में किसानों, चीनी मिलों और गुड़ उद्योग के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
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