महायुति की ‘लाडली बहना योजना’ का सीधा असर कपास किसानों पर

मौसम की मार झेल रहे महाराष्ट्र के कपास किसानों के लिए अब एक और मुश्किल खड़ी हो गई है। कपास तोड़ने के लिए मजदूरों की भारी किल्लत ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। खेतों में फसल तैयार खड़ी है, लेकिन उसे तोड़ने वाले मजदूर नदारद हैं। सरकार की कल्याणकारी योजनाओं, जैसे ‘लाडली बहना योजना’, के कारण मजदूरों का कृषि कार्य से मोहभंग हो रहा है।

महाराष्ट्र में कपास किसानों पर संकट: खेतों से गायब मजदूर और बढ़ती लागत

राज्य के करोड़ों महिलाओं के खातों में ‘लाडली बहना योजना’ के तहत 7,500 रुपए की राशि जमा हो चुकी है। इसका सीधा असर खेतों में दिखाई दे रहा है। नागपुर से 100 किलोमीटर दूर तारोदा गांव के एक किसान ने बताया कि मराठवाड़ा के नांदेड़ या विदर्भ के पुसद जैसे इलाकों से हर साल मजदूर कपास तोड़ने के लिए आते थे। इस बार वे मजदूर अभी तक नहीं पहुंचे हैं। दिवाली के बाद भी मजदूरों का इंतजार किया जा रहा है।

किसानों का कहना है कि कपास तोड़ने के लिए अब दोगुनी मजदूरी देनी पड़ रही है। पहले जो काम सस्ते में हो जाता था, अब उसमें लागत बढ़ रही है। यही नहीं, कपास और सोयाबीन दोनों के बाजार भाव इस समय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से भी नीचे हैं, जिससे किसानों को घाटा हो रहा है।

मनरेगा के बाद से शुरू हुआ संकट

खेती में मजदूरों की कमी का संकट अचानक नहीं आया। जानकारों का कहना है कि यह समस्या मनरेगा योजना लागू होने के बाद शुरू हुई। वर्ष 2006 में यूपीए सरकार ने ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा) के तहत ग्रामीण इलाकों में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी थी। इस योजना ने ग्रामीण मजदूरों को विकल्प तो दिया, लेकिन कृषि क्षेत्र में इसका नकारात्मक असर हुआ।

मनरेगा के तहत काम में कम मेहनत, बेहतर सुविधाएं और मामूली निगरानी ने मजदूरों को कृषि कार्य से दूर कर दिया। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन और किसानों की लागत पर पड़ा। छोटे और मझोले किसानों के लिए खेती करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता गया।

‘लाडकी बहिन योजना’ और बदलती प्राथमिकताएं

हाल ही में शुरू की गई ‘लाडकी बहिन योजना’ ने भी मजदूरों के काम करने की प्राथमिकताओं को बदल दिया है। इस योजना के तहत महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जा रही है, जिससे परिवारों की रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी हो रही हैं। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि मजदूर खेतों में काम करने के बजाय अन्य विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।

तारोदा गांव के किसानों ने बताया कि मजदूरों की कमी से खेती की लागत में दोगुना इजाफा हुआ है। कपास की फसल को समय पर तोड़ा नहीं गया, तो उत्पादन पर असर पड़ सकता है। यह स्थिति विदर्भ के लगभग सभी जिलों में देखी जा रही है।

खेती की बढ़ती लागत और किसान संकट

खेती में मजदूरों की कमी से किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तरफ उन्हें फसल तोड़ने के लिए अधिक पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ फसल के बाजार भाव कम हैं। इस स्थिति में किसानों को या तो घाटा सहना पड़ रहा है, या फिर नाममात्र का लाभ हो रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि खेती को लाभकारी बनाने के लिए सरकार को दीर्घकालिक समाधान निकालने होंगे। मजदूरों को खेती की ओर आकर्षित करने के लिए बेहतर योजनाएं और सुविधाएं दी जानी चाहिए।

कपास किसानों के सामने मजदूरों की किल्लत एक गंभीर समस्या बन चुकी है। ‘लाडली बहना योजना’ और ‘मनरेगा’ जैसी योजनाओं ने मजदूरों को तो लाभ पहुंचाया है, लेकिन इसका असर खेती पर पड़ा है। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं निकाला गया, तो छोटे और मझोले किसानों के लिए खेती करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

 

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