रिपोर्ट: बिचित्र शर्मा
हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश), 08 दिसंबर (कृषि भूमि ब्यूरो): हिमाचल प्रदेश प्राकृतिक खेती का केंद्र बनता जा रहा है, जहां अनेक किसान रासायनिक खेती छोड़कर ज़हरमुक्त और कम लागत वाली खेती को अपना रहे हैं। हमीरपुर जिले के नादौन उपमंडल की ग्राम पंचायत कमलाह के गांव साधबड़ के किसान अमर सिंह भी उन किसानों में शामिल हैं जिन्होंने प्राकृतिक खेती से अपनी जिंदगी ही बदल डाली।
अमर सिंह पहले अपनी पुश्तैनी जमीन पर रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग करते थे, जिससे खेती का खर्च बढ़ता जा रहा था और मिट्टी की उर्वरा शक्ति लगातार घट रही थी। रसायनों के उपयोग से खाद्यान्न और सब्जियों में भी प्रदूषण बढ़ रहा था। इसी बीच उन्हें प्राकृतिक खेती और पॉलीहाउस की जानकारी मिली, जिसने उनकी खेती का रुख ही बदल दिया।
पॉलीहाउस और प्रशिक्षण से मिली नई दिशा
अमर सिंह ने शुरुआत पॉलीहाउस और नर्सरी स्थापित करके की, जिसमें उन्हें शुरुआती लाभ मिला। इसके बाद उन्होंने कृषि विभाग की आत्मा परियोजना के अधिकारियों से मार्गदर्शन लिया और प्राकृतिक खेती में कदम रखा।
प्रदेश सरकार की प्राकृतिक खेती प्रोत्साहन योजना के तहत उन्हें दो दिन का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही, प्राकृतिक खेती में उपयोग होने वाली सामग्री और ड्रम आदि पर 80 प्रतिशत सब्सिडी भी प्रदान की गई। यह समर्थन उनकी खेती को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण रहा।
जीवामृत से उग रही हैं दर्जनों फसलें
आज अमर सिंह पूरी तरह प्राकृतिक खेती पर निर्भर हैं। वह घर पर ही गोबर, गोमूत्र, शक्कर और बेसन से जीवामृत बनाते हैं और खेतों में इसका छिड़काव करते हैं। इससे न केवल उनकी मिट्टी की उर्वरा शक्ति लौटी है, बल्कि फसलों की पैदावार भी बेहतर होने लगी है।
अमर सिंह आलू, प्याज, लहसुन, गोभी, बैंगन, सरसों और अन्य मौसमी सब्जियां पूरी तरह प्राकृतिक विधि से उगा रहे हैं। इनकी स्थानीय बाजार में अच्छी मांग है और वे सालाना लगभग एक लाख रुपये की सब्जियां बेच रहे हैं।
इसके अलावा उन्होंने अमरुद, पपीता, कीवी और अन्य फलदार पेड़ भी लगाए हैं, जो भविष्य में उन्हें अतिरिक्त आय देंगे।
प्राकृतिक खेती बनी आय और स्वास्थ्य दोनों की गारंटी
अमर सिंह बताते हैं कि प्राकृतिक खेती से उन्हें दो बड़े फायदे मिले – पहला, खेती का खर्च बहुत कम हो गया। दूसरा, परिवार के लिए पूरी तरह स्वस्थ और जहरमुक्त खाद्यान्न मिलने लगे।
सस्ती और सुरक्षित खेती का यह तरीका आज न सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति सुधार रहा है, बल्कि टिकाऊ खेती की ओर भी प्रेरित कर रहा है। अमर सिंह का कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाकर वे अपनी भूमि, पर्यावरण और परिवार—तीनों को सुरक्षित रख पा रहे हैं।
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