मुंबई, 19 फरवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): महाराष्ट्र के कपास किसानों को संभावित आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने केंद्र सरकार से अहम हस्तक्षेप की मांग की है। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह को पत्र लिखकर कपास सीजन 2025-26 के लिए Cotton Corporation of India – CCI द्वारा की जा रही सरकारी खरीद की अवधि बढ़ाने का अनुरोध किया है।
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में बताया कि CCI ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर कपास खरीद की अंतिम तिथि 27 फरवरी 2026 तय की है, जबकि राज्य में अब भी बड़ी मात्रा में किसानों की कपास बिना बिके पड़ी हुई है।
खरीद बंद होने से मंडियों में गिर सकते हैं दाम
सीएम फडणवीस ने चेतावनी दी है कि यदि तय समय पर सरकारी खरीद बंद हो जाती है, तो खुले बाजार में कपास के दामों में तेज गिरावट आ सकती है। इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। मौजूदा हालात को देखते हुए उन्होंने कपास खरीद की अवधि को 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाने को जरूरी बताया, ताकि किसानों को अपनी उपज उचित मूल्य पर बेचने का पर्याप्त समय मिल सके।
अप्रैल तक जारी रहे सरकारी खरीद: सीएम की मांग
मुख्यमंत्री ने केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय से आग्रह किया है कि CCI को निर्देश जारी कर कपास सीजन 2025-26 के लिए खरीद प्रक्रिया को अप्रैल के अंत तक जारी रखा जाए। उनका कहना है कि यह फैसला महाराष्ट्र के लाखों कपास उत्पादक किसानों के हितों की रक्षा के लिए बेहद अहम है।
कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)
खरीफ मार्केटिंग सीजन 2025-26 के लिए केंद्र सरकार ने कपास का MSP इस प्रकार तय किया है:
| कपास का प्रकार | MSP (₹/क्विंटल) |
|---|---|
| मध्यम रेशा कपास (Medium Staple) | 7,710 |
| लंबा रेशा कपास (Long Staple) | 8,110 |
शुल्क मुक्त आयात से बढ़ा दबाव
हालांकि सरकार ने चालू सीजन में कपास के MSP में बढ़ोतरी की, लेकिन सितंबर में लिए गए एक फैसले से किसानों को नुकसान झेलना पड़ा। सरकार ने सितंबर के अंत से 31 दिसंबर 2025 तक कपास के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति दी थी। 11 आयात शुल्क हटने के बाद बड़ी मात्रा में विदेशी कपास भारत पहुंची, जिससे घरेलू बाजार में कीमतों पर जबरदस्त दबाव बढ़ गया।
सरकारी खरीद से किसानों को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन यदि इसकी अवधि नहीं बढ़ाई गई तो एक बार फिर किसानों को कम दामों पर कपास बेचने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। कुल मिलाकर, अब किसानों की नजर केंद्र सरकार के फैसले पर टिकी हुई है।
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