जयपुर, 29 दिसंबर (कृषि भूमि ब्यूरो): राजस्थान के चूरू जिले के खारे पानी वाले इलाकों में, जहां पारंपरिक खेती लगभग असंभव है, वहां झींगा पालन किसानों के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरा है। सीमित वर्षा और ऊँची लवणता वाली ज़मीन में जहां केवल बाजरा या मूंग की एक फसल ही संभव हो पाती है, वहीं झींगा पालन ने किसानों को वैकल्पिक आय का जरिया दिया।
हालांकि, इस नकदी फसल को ऊँची बिजली दरों ने संकट में डाल दिया है। चूरू में झींगा किसानों को 12 रुपये प्रति यूनिट तक बिजली टैरिफ चुकाना पड़ रहा है।
झींगा पालन में कुल इनपुट लागत का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा बिजली पर खर्च होता है, क्योंकि तीन महीने के फसल चक्र में पानी में ऑक्सीजन का स्तर बनाए रखना बेहद ज़रूरी होता है।
हरियाणा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में झींगा पालन को कृषि गतिविधि का दर्जा दिया गया है, जिससे किसानों को रियायती और स्थिर बिजली दरों का लाभ मिलता है।
इसके उलट, राजस्थान सरकार झींगा पालन को गैर-घरेलू, गैर-कृषि श्रेणी में रखती है, जिस पर सबसे ऊँची कमर्शियल बिजली दरें लागू होती हैं।
जुर्माना और सप्लाई कटौती ने बढ़ाया संकट
कुछ किसानों ने ऊँची दरों से बचने के लिए वैकल्पिक कनेक्शन का सहारा लिया, लेकिन जांच के बाद उन पर 7 से 10 लाख रुपये तक का भारी जुर्माना लगाया गया। कई मामलों में बिजली सप्लाई भी काट दी गई, जिससे झींगा फसल के खराब होने का खतरा पैदा हो गया।
झींगा पालन में एक फसल चक्र पर 15 से 20 लाख रुपये तक का निवेश होता है। ऐसे में बिजली कटने या फसल नष्ट होने का मतलब किसानों के लिए भारी आर्थिक नुकसान है।
इस मुद्दे पर चूरू से सांसद राहुल कासवान ने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा, “चूरू जिले में कई इलाकों में आप केवल मानसून के भरोसे एक ही फसल ले सकते हैं। झींगा पालन किसानों के लिए वरदान बनकर आया है, लेकिन सरकार इसे बढ़ावा देने के बजाय ऊँची बिजली दरों से खत्म करने पर तुली है।”
उन्होंने बताया कि अन्य राज्यों ने कृषि और एक्वाकल्चर के लिए अलग बिजली स्लैब बनाए हैं और राजस्थान को भी इसी दिशा में कदम उठाना चाहिए।
भारी जुर्मानों और सप्लाई कटौती के खिलाफ कुछ किसान अदालत का रुख कर चुके हैं, जबकि कई मजबूरी में जुर्माना भरने को विवश हुए हैं। अन्य किसान राहत की उम्मीद में सरकार और विभागों के चक्कर लगा रहे हैं।
झींगा पालन का विस्तार, लेकिन नीति बाधा
फिलहाल, चूरू जिले में लगभग 300 किसान झींगा पालन से जुड़े हुए हैं। इसके साथ ही बीकानेर, श्रीगंगानगर और नागौर जैसे जिलों में भी खारे पानी वाले क्षेत्रों में यह गतिविधि तेज़ी से बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नीतिगत समर्थन और रियायती बिजली दरें नहीं मिलीं, तो राजस्थान में उभरता हुआ झींगा उद्योग ठहर सकता है, जबकि सही फैसलों से यह क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बन सकता है।
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