नई दिल्ली, 01 जनवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): नए साल के पहले दिन कपास बाजार में बड़ा नीतिगत मोड़ आया। ड्यूटी-फ्री कपास आयात की समय-सीमा खत्म होते ही सरकार की ओर से कोई विस्तार अधिसूचना जारी नहीं हुई। नतीजतन, 1 जनवरी से कपास आयात पर 11% शुल्क स्वतः लागू हो गया है—कम से कम तब तक, जब तक नया आदेश नहीं आता।
नीति का असर जमीन पर साफ दिख रहा है। विदर्भ में कपास के भाव 7,500–7,700 रुपये प्रति क्विंटल के दायरे में बने हुए हैं, जबकि MSP 8,110 रुपये है। यानी किसान बाजार में MSP से नीचे बेचने को मजबूर हैं। राहत का सहारा कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) बना है, जिसने 30 दिसंबर तक 61.5 लाख गांठ MSP पर खरीदी। MSP बिक्री के लिए पंजीकरण की अंतिम तिथि 31 दिसंबर से बढ़ाकर 16 जनवरी कर दी गई है।
उद्योग की चिंता: लागत और प्रतिस्पर्धा
टेक्सटाइल कंपनियों का तर्क अलग है। ड्यूटी हटने के दौरान आयात सस्ता पड़ा, लेकिन शुल्क लौटते ही लागत बढ़ गई। विदर्भ के एक कारोबारी ने बताया, घरेलू कपास की दरें 58,500 रुपये प्रति गांठ तक पहुंच गई हैं और टैरिफ युद्ध के चलते आयात करीब 4,000 रुपये प्रति गांठ महंगा हो गया है। इंडस्ट्री को डर है कि इससे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी।
क्यों हटाई गई थी ड्यूटी—और अब क्यों लौटी?
अगस्त में, अमेरिका के साथ टैरिफ तनाव के बीच भारत ने 11% आयात शुल्क अस्थायी रूप से हटाया था। इसका असर आयात पर दिखा। इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी (ICAC) के मुताबिक, सितंबर मध्य तक भारत ने 36 लाख गांठ कपास आयात किया—जिसमें ब्राजील (23%), अमेरिका (20%) और ऑस्ट्रेलिया (19%) प्रमुख रहे।
अब ड्यूटी की वापसी से सरकार का संदेश स्पष्ट है: घरेलू किसानों की कीमत सुरक्षा प्राथमिकता है, भले ही उद्योग की लागत बढ़े। बाजार सूत्र बताते हैं कि शुल्क लौटने के बाद कुछ मंडियों में कपास के भाव 6,700 रुपये प्रति क्विंटल तक दबाव में आए। यह विरोधाभास नीति की जटिलता दिखाता है—एक तरफ आयात महंगा, दूसरी तरफ घरेलू भाव अभी भी कमजोर।
यह फैसला किसानों के लिए संकेतात्मक सुरक्षा देता है, लेकिन टेक्सटाइल वैल्यू-चेन पर दबाव भी बढ़ाता है। आने वाले हफ्तों में दो सवाल निर्णायक होंगे। पहला, क्या सरकार अस्थायी राहत या चरणबद्ध शुल्क पर विचार करेगी? दूसरा, क्या CCI की खरीद बाजार में MSP को प्रभावी बेंचमार्क बना पाएगी?
कुलमिलाकर, कपास की इस रस्साकशी में नीति का अगला कदम तय करेगा कि 2026 का सीजन किसान-हित में मुड़ेगा या उद्योग-प्रतिस्पर्धा की नई कसौटी बनेगा।
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