नई दिल्ली, 12 फरवरी (कृषि भूमि ब्यूरो): बीते वित्तीय वर्ष में रिकॉर्ड 7.3 मिलियन टन दाल आयात करने के बाद, मौजूदा वित्तीय वर्ष (FY26) में भारत की आयात रफ्तार काफी धीमी पड़ गई है। पर्याप्त घरेलू स्टॉक और आगामी रबी सीजन में अच्छी पैदावार की उम्मीद ने विदेशों से खरीद की जरूरत कम कर दी है।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच दालों का आयात 23 प्रतिशत घटकर 3.26 मिलियन टन रह गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 4.22 मिलियन टन था। India Pulses and Grains Association के अनुसार, पूरे FY26 में कुल दाल आयात करीब 4.5 मिलियन टन रहने की संभावना है, जो पिछले साल के मुकाबले काफी कम होगा।
आयात बिल में 38% की बड़ी बचत
मात्रा ही नहीं, लागत के मोर्चे पर भी बड़ी राहत मिली है। अप्रैल-नवंबर के दौरान भारत ने 2.06 बिलियन डॉलर की दालें आयात कीं, जो पिछले वर्ष के 3.33 बिलियन डॉलर के मुकाबले 38 प्रतिशत कम है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में गिरावट इसका प्रमुख कारण रही।
| दाल | पहले कीमत ($/टन) | वर्तमान कीमत ($/टन) |
|---|---|---|
| पीली मटर | 400 | 300 |
| चना (बेंगल ग्राम) | 700 | 520 |
कीमतों में इस गिरावट ने आयात बिल को काफी हद तक कम कर दिया।
किस दाल में कितनी कमी?
विभिन्न किस्मों के आयात आंकड़े अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं।
- अरहर (तुअर) आयात में 5% गिरावट
- मसूर में 24% कमी
- पीली मटर में सबसे बड़ी 52% गिरावट
- उड़द में 43% की बढ़ोतरी
भारत अपनी कुल खपत का लगभग 18–20 प्रतिशत हिस्सा कनाडा, रूस, ब्राजील, म्यांमार और अफ्रीकी देशों से आयात करता है।
घरेलू उत्पादन से उम्मीदें मजबूत
इस साल हुई अच्छी बारिश से मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी हुई है। इससे रबी सीजन में चना, मसूर और मूंग की बेहतर पैदावार की उम्मीद जताई जा रही है।
सरकारी अनुमान के अनुसार, 2024-25 में दालों का कुल उत्पादन 25.68 मिलियन टन रहा था। यदि रबी फसल उम्मीद के अनुरूप रही, तो आयात पर निर्भरता और घट सकती है।
सरकार की मौजूदा आयात नीति
सरकार ने तुअर और उड़द के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति 31 मार्च 2026 तक दी है। वहीं, पीली मटर पर 30 प्रतिशत और मसूर पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क लागू है। विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू उत्पादन में वृद्धि से स्थानीय किसानों को बेहतर कीमत मिल सकती है और लंबे समय में आयात पर निर्भरता कम हो सकती है। दाल आयात में आई 23 प्रतिशत की गिरावट संकेत देती है कि भारत अब धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में नरमी और घरेलू पैदावार की उम्मीद ने आयात बिल पर दबाव कम किया है। आने वाले महीनों में रबी फसल का प्रदर्शन तय करेगा कि यह रुझान कितना टिकाऊ साबित होगा।
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