Sugar Export: खाद्य मंत्रालय ने चीनी मिलों के लिए जारी किया मिल-वार निर्यात कोटा, जानें कितना होगा एक्‍सपोर्ट

मुंबई, 14 नवंबर (कृषि भूमि डेस्क): भारत का चीनी उद्योग (Cheeni Udhyog) दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादकों में से एक है। हर साल, रिकॉर्ड उत्पादन (Record Production) के बाद, केंद्र सरकार के लिए घरेलू आपूर्ति को स्थिर रखने और चीनी निर्यात (Suger Production) के माध्यम से चीनी मिलों (Cheeni Milen) को वित्तीय सहायता प्रदान करने के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती होती है। इसी क्रम में, खाद्य मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए, इस सीजन के लिए चीनी निर्यात हेतु मिल-वार कोटा (Mill-wise Quota) आवंटित कर दिया है। यह कदम चीनी उद्योग को उसकी इन्वेंट्री (Inventory) प्रबंधित करने और गन्ना किसानों (Ganna Kisano) का समय पर भुगतान (Bhugtaan) सुनिश्चित करने में मदद करेगा।

क्‍या कहता है नोटिफिकेशन:

जो नोटिफिकेशन शुगर मिल्‍स को भेजा गया है, उसमें कहा गया है, ‘सभी शुगर मिलों को उनके तीन सालों के औसत उत्पादन का 5.286 प्रतिशत समान रूप से कोटा अलॉट किया गया है.’ इसके अलावा, यह भी बताया गया कि मिलें इस तय की गई मात्रा की चीनी का निर्यात खुद या व्यापारी एक्‍सपोर्टस/रिफाइनरियों के जरिये 30 सितंबर तक कर सकती हैं. बिल ऑफ लैडिंग (BL) की अंतिम तिथि भी 30 सितंबर ही होगी. हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि निर्यात की मंजूरी किस तारीख से शुरू होगी.

कोटा आवंटन का कारण: संतुलन की रणनीति

खाद्य मंत्रालय द्वारा निर्यात कोटा जारी करने का मुख्य उद्देश्य दोहरी रणनीति पर काम करना है:

  1. घरेलू बाजार में स्थिरता: सबसे पहली प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि देश में चीनी की कोई कमी न हो और त्योहारी सीजन के दौरान चीनी के दाम नियंत्रण में रहें। इसीलिए सरकार निर्यात की अनुमति तभी देती है जब घरेलू आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं।
  2. चीनी मिलों को राहत: अत्यधिक उत्पादन (Excess Production) के कारण चीनी मिलों पर स्टॉक का भारी बोझ होता है। निर्यात की अनुमति मिलने से मिलें अपने अतिरिक्त स्टॉक को बेच पाती हैं, जिससे उन्हें नकदी का प्रवाह (Cash Flow) मिलता है। यह नकदी उन्हें किसानों के FRP (Fair and Remunerative Price) बकाया चुकाने में मदद करती है।

इस सरकारी नीति (Sarkari Niti) के तहत, खाद्य मंत्रालय निर्यात की कुल मात्रा निर्धारित करता है और फिर उसे प्रत्येक चीनी मिल को उनकी उत्पादन क्षमता (Production Capacity) और पिछले रिकॉर्ड के आधार पर आवंटित करता है।

‘मिल-वार’ कोटा प्रणाली का महत्व

मिल-वार कोटा (Mill-wise Quota) प्रणाली का आवंटन सामान्य निर्यात की अनुमति देने से कहीं अधिक प्रभावी और न्यायसंगत माना जाता है। इस प्रणाली के कई लाभ हैं:

  • समान वितरण: यह सुनिश्चित करता है कि चीनी निर्यात का लाभ केवल कुछ बड़ी चीनी मिलों तक सीमित न रहे, बल्कि छोटे और मध्यम आकार की चीनी मिलें भी अपने कोटे के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच सकें।
  • जवाबदेही (Accountability): प्रत्येक चीनी मिल को पता होता है कि उसे कितना निर्यात करना है, जिससे वे तय समय-सीमा के भीतर शिपमेंट (Shipment) की योजना बना पाती हैं।
  • भंडारण प्रबंधन: निर्यात कोटा मिलने से चीनी मिलों को पता होता है कि उन्हें कितना स्टॉक खाली करना है, जिससे वे अपने भंडारण (Storage) को बेहतर ढंग से प्रबंधित कर पाती हैं और अगले क्रशिंग सीजन (Crushing Season) के लिए जगह बना पाती हैं। यह चीनी उद्योग के सुचारू संचालन के लिए आवश्यक है।
  • Black Marketing पर नियंत्रण: यह प्रणाली अनियंत्रित निर्यात को रोकती है, जिससे घरेलू बाजार में चीनी की कृत्रिम कमी पैदा होने और कालाबाजारी (Black Marketing) की आशंका कम हो जाती है।

चीनी उद्योग पर आर्थिक और राजनीतिक असर

निर्यात कोटा का आवंटन चीनी उद्योग (Cheeni Udhyog) के लिए एक बड़ा आर्थिक प्रोत्साहन (Economic Stimulus) है।

  • निर्यात आय: चीनी मिलों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से अच्छी निर्यात आय (Export Revenue) प्राप्त होती है, जो उनकी बैलेंस शीट (Balance Sheet) को मजबूत करती है।
  • किसान भुगतान: नकदी का प्रवाह बढ़ने से किसानों के गन्ने का बकाया (Sugarcane Arrears) चुकाने की मिलों की क्षमता में सुधार होता है। यह राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील मुद्दा है, इसलिए खाद्य मंत्रालय इस पहलू पर विशेष ध्यान देता है।
  • सरकारी नीति की भूमिका: यह सरकारी नीति यह दर्शाती है कि सरकार चीनी मिलों को प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने के लिए सक्रिय रूप से अंतर्राष्ट्रीय बाजार (International Market) तक पहुंचने में मदद कर रही है, लेकिन घरेलू उपभोक्ता (Domestic Consumer) के हितों की अनदेखी नहीं की जाएगी।

खाद्य मंत्रालय द्वारा चीनी निर्यात के लिए मिल-वार कोटा का आवंटन एक संतुलित और सोच-समझकर लिया गया निर्णय है। यह चीनी उद्योग के लिए एक विन-विन सिचुएशन (Win-Win Situation) बनाता है—जहां मिलें अपने अतिरिक्त स्टॉक को बेचकर वित्तीय मजबूती हासिल करती हैं, वहीं घरेलू आपूर्ति स्थिर बनी रहती है। यह पहल चीनी निर्यात को एक स्थिर सरकारी नीति के तहत आगे बढ़ाने और गन्ना किसानों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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